नील कुरिंजी

नीलू ने 15 अगस्त, 2018 के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण मे नीलगिरी की पहाड़ियों में खिलने वाले खूबसूरत नीले रंग के नील कुरिंजी फूल के बारे में सुना, जो 12 साल के लंबे इंतजार के बाद खिला है. इसके साथ ही उसे याद आ गई नीलेश की वे स्मृतियां, जो 12 साल से उसने अपने सीने में दफन कर रखी थीं.

वह नीलेश के साथ पिकनिक पर गई थी. संध्या का झुटपुटा घिर आया था. वे दोनों सागर-किनारे बैठे अपलक लहरों को निहार रहे थे. अचानक नीलेश के छप्प से गिरने की आवाज आई. नीलू ने उसको डूबते-उतराते देखा, पर कुछ कर नहीं पाई थी. इतना तो उसे भरोसा था, कि नीलेश डूब नहीं सकता. तैराकी में ढेरों पुरस्कार उसके नाम थे. तब से अब तक उसकी अनगिनत यादें ही उसका सहारा बनी हुई थीं, पर कोई संदेश नहीं आ पाया था. पिछले 12 साल में मोबाइल तकनीक ने न जाने कितनी प्रगति कर ली थी, उसने कभी मोबाइल खराब होने पर, कभी खो जाने पर मोबाइल भी बदले थे, पर किसी तरह नंबर वही रहने दिया था. दिन में 50 बार वह नीलेश का संदेश देखने के लिए मोबाइल को टटोलती.

तभी मोबाइल ने संदेश दिखाया. ”नीलू, मैं बच गया हूं. मेरी याददाश्त भी वापिस आ गई है. शहर तक आ गया हूं. थोड़ी देर में घर पहुंचूंगा.”

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।