लघुकथा

अहसास

 

बहुत छोटी सी थी सुधा जब राहुल उसे अनाथालय से अपने घर लाया था । विधुर राहुल ने बड़े मनोयोग से उस अनाथ बच्ची सुधा की परवरिश की और उसे ऊँची शिक्षा के साथ समाज में सम्मान और बेहतर जिंदगी भी दी । सोशल मीडिया के आकर्षण से सुधा भी अछूती नहीं थी । उसका फेसबुक फ्रेंड सावन बराबर उसके संपर्क में बना हुआ था । खबरों में आये दिन महिलाओं पर हुए अत्याचारों व बलात्कार की चर्चा सोशल मीडिया पर बहस का मुद्दा बना हुआ था । सावन ने सुधा को आगाह करते हुए उसे खबरों का हवाला देते हुए बताया कि उसे राहुल से भी सावधान रहना चाहिए । आखिर वो भी तो पुरुष है । क्या भरोसा ?
जबकि असलियत कुछ और ही थी । राहुल को सुधा के लिए सावन बिलकुल भी पसंद नहीं था क्योंकि उसे सावन के दुर्गुणों की असलियत पता थी । सावन अपना हित साधने के लिए राहुल के प्रति सुधा के मन में नफ़रत भरने में लगा हुआ था ।
पड़ोस के मनोज अंकल सारा मामला समझ रहे थे । एक दिन मौका देखकर उन्होंने सुधा को समझाया ,” बेटी ! तुम पढ़ी लिखी समझदार हो । सावन अपना हित साधने में लगा हुआ है । वह राहुल के खिलाफ कुछ भी भले कहे लेकिन तुम कैसे उसकी बात पर यकीन कर सकती हो ? छोटी सी बच्ची से आज एक युवा महिला तक के सफर में राहुल ने हर घडी तुम्हारा साथ निभाया है । दूसरों से तुम्हें महफूज रखा है और आज चार दिन की पहचान में वह झूठा सावन तुम्हें विश्वसनीय लगने लगा ? अगर उसे तुम्हारा अहित ही करना होता तो उसके पास तो मौके ही मौके थे । क्यों नहीं किया ? सुधा ! तुम समझदार हो ! अपने दिमाग का इस्तेमाल करो और सावन जैसे पाखंडियों को खदेड़ दो अपनी जिंदगी से । ”
सुधा को अपनी गलती का अहसास हो गया था ।

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।