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दान वहां देना चाहिये जहां चेतन प्राणियों की सेवा होती है : आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ

ओ३म्

वैदिक साधन आश्रम, तपोवन-देहरादून के शरदुत्सव के चौथे दिन का प्रातःकालीन आयोजन प्रातः 5.00 बजे से योगासन एवं ध्यान आदि से आरम्भ हुआ। प्रातः 6.30 बजे से यजुर्वेद पारायण यज्ञ वैदिक साधन आश्रम तपोवन की पर्वत व वनों में स्थित ईकाई में सम्पन्न किया गया। यज्ञ के ब्रह्मा स्वामी चित्तेश्वरानन्द सरस्वती जी थे। यज्ञ में मंत्रोच्चार गुरुकुल पौंधा के दो ब्रह्मचारी श्री ओम्प्रकाश एवं श्री विनीत कुमार ने किया। यज्ञ के बाद भजन एवं प्रवचन हुए। मुख्य प्रवचन आगरा से पधारे विद्वान आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी का हुआ। अपने प्रवचन में श्री कुलश्रेष्ठ जी ने दान के दार्शनिक महत्व पर प्रकाश डाला। हम दान क्यों दें, इस विषय में वेद क्या कहता है? आदि की चर्चा विद्वान वक्ता ने की। उन्होंने कहा कि युवापीढ़ी से शुभ कार्यों में दान देने की बात करते हैं तो उनका उत्तर होता है कि हम मेहनत करते हैं। 12 घंटे काम करते हैं और आप कहते हैं कि हम जो धन कमाते हैं उसमें से हम दान किया करें। दान के विषय में वेदों का आदेश है कि हमें दान करना चाहिये। आचार्य जी ने ऋग्वेद के एक मन्त्र का उच्चारण किया। उन्होंने कहा कि हम आज का दिन देख रहे हैं परन्तु हमें आने वाले इस जन्म के शेष दिन और मृत्यु के बाद की अवस्था का ज्ञान नहीं है। क्या किसी ने उन्हें देखा है? किसी ने नहीं देखा। सभी लोग आने वाले दिनों में सुखी रहना चाहते हैं। इसका उपाय वेद बताता है कि सभी को दान करना चाहिये। यदि आपके पास कोई याचक आ जाये तो उसकी उचित आवश्यकताओं को पूरा किया कीजिए। आचार्य जी ने दान व सुख की चर्चा की और इससे सम्बन्धित एक ऋग्वेद के मन्त्र का उच्चारण किया। इस मन्त्र में ईश्वर ने कहा है कि वह ईश्वर इस भवन का स्वामी है। ईश्वर कहता है कि निश्चय से इस संसार के समस्त धनों का स्वामी वही है। हम संसार में नया सामान बनाते हैं। इस नये सामान में जिन पदार्थों का प्रयोग किया जाता है वह मिट्टी, जल, वायु, सूर्य का प्रकाश व गर्मी आदि सब ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में बनाकर हमें प्रदान किए हैं। यदि ईश्वर ने सृष्टि न बनाई होती और हमें जन्म न दिया होता तो हम कुछ नहीं कर सकते थे। आचार्य जी ने कहा कि संसार में जो मूल पदार्थ विद्यमान हैं उनका स्वामी परमात्मा ही है अन्य कोई नहीं है। परमात्मा सर्वशक्तिमान है और वही सब पदार्थों व धनों का स्वामी है।

आचार्य जी ने कहा कि मनुष्य संसार में धन अर्जित करते हैं परन्तु जब मृत्यु होती है तो सब धन संसार में ही छूट जाता है और जीवात्मा शरीर का त्याग कर अकेला बिना किसी धन व पदार्थ के चला जाता है। आचार्य जी ने इसका एक उदाहरण दिया। एक व्यक्ति के पास सोने की गिन्नियां थी। उसने हलुवे के साथ खा ली और मर गया। शिष्यों ने उसका अन्त्येष्टि कर्म कराया। अस्थि-चयन के समय वह सोने कि गिन्नियां विकृत रूप में उसकी चिता के स्थान पर मिलीं। इस घटना से यही सिद्ध होता है कि संसार के किसी पदार्थ को हम मृत्यु के समय अपने साथ नहीं ले जा सकते। सब यहीं छूट जाता है। परमात्मा पृथिवी पर जीवात्माओं को सब सामान देता है परन्तु हम इसे यहां से अपने साथ परलोक में नहीं ले जा सकते। वेद में परमात्मा कहते हैं कि मैं धन का स्वामी हूं और धन की वर्षा करता हूं। आचार्य जी ने प्रश्न किया कि क्या परमात्मा दानशीलों को दुःखी रहने देता है। परमात्मा दान देने वालों की भावनाओं को जानता है। जो लोग शुभ कार्यों वेद विद्या के प्रचार व प्रसार, अन्धविश्वास व अविद्या निवारण, दुखियों की सेवा तथा देश हित के कार्यों आदि में दान देते हैं उनका वह धन परमात्मा के बैंक में जमा होता है। आचार्य जी ने यज्ञोपवीत के तीन धागों की चर्चा भी की। उन्होंने आर्यजनों को कहा कि आप लोग ऋषियों के ज्ञान का विस्तार कर रहे हैं। ईश्वर दान में दिये गये हमारे धन को कई गुणा बढ़ाकर हमें आवश्यकतानुसार देता है। हम लोग जो दान करते हैं उसे ऐश्वर्यवान्, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी और सबका साक्षी परमात्मा उचित अवसर पर हमें कई गुणा अधिक लौटाता है।

हम जो दान करते हैं वह परजन्म में हमें प्राप्त होता है। आचार्य जी ने एक सेठ का उदाहरण देते हुए बताया कि उसके सुपुत्र का विवाह हुआ। पुत्रवधु गर्भवती है। प्रसव के लिये उसे सबसे अच्छे अस्पताल में भर्ती किया जाता है। सेठ जी को वहां पौत्र की प्राप्ति होती है। सब सेठ जी को बधाईयां दे रहे हैं। मिठाईयां बांटी जा रही है। मंगल गान गाये जा रहे हैं। निर्धनों को दान दिया जा रहा है। यह बच्चा जिसने अभी संसार में कोई काम नहीं किया, सेठ जी और अपने पिता की करोड़ो की सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बन जाता है। इसे सुख की सब सुविधायें प्राप्त है। इसकी सेवा के लिये सभी प्रकार के नौकर-चाकर और डॉक्टरों की सुविधाये ंउपलब्ध है। दूसरी ओर एक निर्धन गर्भवती महिला से किसी नगर या गांव की बस्ती में एक सन्तान का जन्म होता है। वहां माता को अत्यन्त पीड़ा को सहन करना पड़ता है। बच्चे के लिये कोई सुख सुविधा नहीं है। झोपड़ी में गर्मी व मच्छरों से मां व बच्चा व्याकुल रहते हैं। भोजन की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। मां व बच्चा दोनों क्लेशित अवस्था में रहते हैं। आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि जिस जीवात्मा ने पूर्वजन्म में दान पुण्य के काम किये वह सेठ जी के यहां उत्पन्न हुआ और जिसने दान पुण्य नहीं किये, दूसरों से धन ठगा व सुख सुविधायें भोगी उसका जन्म एक निर्धन मां के यहां झोपड़ी में हुआ।

आचार्य कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि जो मनुष्य किसी की मदद नहीं करता न दान देता है, वह जो खाता है वह पापमय भोजन होता है। आचार्य जी के अनुसार इन घटनाओं से पता लगता है कि पिछले जीवन के कर्म हमें इस जन्म में फल देते हैं। हम यज्ञ में जो आहुतियां देते हैं वह आगे-आगे चलती हैं। दान भी आगे-आगे चलता है। यह आत्मा से अलग नहीं होती। आत्मा से हमारे यज्ञ कर्म, दान, परोपकार आदि के रूप में किये गये सभी सद्कर्म जुड़े रहते हैं। आत्मा जहां जहां जाता है इसके पूर्वजन्म व इस जन्म के कर्म उससे जुड़े रहते हैं, अलग नहीं होते। आचार्य जी ने दान का महत्व बताते हुए कहा कि हमारे कर्म भोग बनकर साथ चलते हैं। यदि हम शुभ कर्म व दान नहीं करेंगे तो यह कर्म दुःख बन कर जीवन में आयेगा। आचार्य जी ने कहा किसान को बीस बोरी अन्न प्राप्त हुआ तो वह 18 अपने लिये रखता है और दो बोरी बीज बोने के लिये रखता है। यदि वह पूरा अन्न खा जाये तो बीज न बोने से उसे भविष्य में भूखा मरना होगा। इसी प्रकार से दान की उपमा किसान के बीज के लिये रखे गये अन्न से दी जा सकती है। यदि हम दान रूपी बीज नहीं बोयेंगे तो काटेंगे क्या?

हम परलोक में सुखी व सुरक्षित रहें, इसलिये हमें दान करता है। आचार्य जी ने कहा कि कभी कभी किसी का कोई कर्म बिगड़ जाये और माना कि वह अगले जन्म में कुत्ता बन जाये तो कुत्तों की भी कई श्रेणियां देखने को मिलती है। जिसने दान पुण्य कर रखा ह,ै ऐसा व्यक्ति किसी सेठ-सेठानी के कुत्ते के रूप में नाना प्रकार के सुख पाता है और दूसरे गली मुहल्ले के कुत्ते दर दर भटकते रहते हैं। गली मुहल्ले के कुत्ते वह कुत्ते हैं जिन्होंने पूर्वजन्म में दान व श्रेष्ठ कर्मों का धारण नहीं किया। आचार्य जी ने कहा कि ऐसा भी देखने को मिलता कि सेठानी जी ने कुत्ते के पिल्ले को गोद में लिया है और वह उसका लाड-प्यार-दुलार कर रही है जबकि उसके अपने बच्चे को नौकरानी सम्भाल रही है। उन्होंने कहा कि यह विचित्र व्यवस्था है। आचार्य जी ने कहा कि इस सृष्टि को बनाने वाला परमात्मा है। दान देने की प्रेरणा उसी ने वेदों में की है। तर्क व युक्ति से भी सुपात्रों को दान देना सत्य सिद्ध होता है। आचार्य जी ने कहा कि मन्दिरों में मूर्तियों को भोग व उन्हें महंगे वस्त्र पहलाने का कार्य होता है। इस कार्य को आचार्य जी ने निरर्थक कार्य बताया। उन्होंने कहा कि दान देना दार्शनिक दृष्टि से भी सिद्ध है। दान वहां देना चाहिये जहां चेतन प्राणी की सेवा होती है। चेतन की सेवा में हम जो धन व्यय करेंगे वह परमात्मा के बैंक में जमा होगा। उन्होंने कहा कि सर्वोत्तम दान विद्या का दान है। चेतन प्राणी सुख व दुख अनुभव करता है। उन्हें दान देना फलीभूत होता है। उन्होंने कहा कि वेद ही वह ज्ञान है जो अविद्या को हटाता है। श्री कुलश्रेष्ठ जी ने कहा कि विचारों का भी दान होता है। यदि हम झगड़ रहे किन्हीं व्यक्तियों को समझा कर उन्हें कलह से दूर करते हैं तो यह भी दान है। आचार्य जी ने अपने वक्तव्य को विराम देते हुए सभी श्रोताओं को सुपात्रों, देश तथा समाज हित के कार्यों में दान देने की प्रेरणा की। उन्होंने कहा कि आप खूब यज्ञ किया कीजिये और चम्मच भर-भर कर घी डाला कीजिये। इससे आपको अनेक लाभ होंगे।

आचार्य उमेशचन्द्र कुलश्रेष्ठ जी से पूर्व पं. नरेश दत्त आर्य जी के कई भजन हुए। उनका एक भजन था ‘‘स्वच्छता सफाई का ध्यान कीजिये मानवता की रक्षा का सामान कीजिये।” पंडित जी ने उदाहरण देकर बताया कि पढ़े लिखे अधिक गन्दगी करते हैं। उन्होंने बताया कि समाचार पत्र में उन्होंने पढ़ा है यदि इसी प्रकार से व्यवस्था चलती रही तो आने वाले 20 वर्ष बाद मनुष्य की आयु घट कर 6 घंटे मात्र रह जायेगी। उन्होंने कहा कि आजकल जो बड़ी बड़ी बीमारियां होती हैं उनका आरम्भ विदेशी जीवन पद्धति के कारण पहले विदेशों में हुआ। हमने भी उनकी जीवन शैली को अपना लिया जिससे हम भी उन बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। कार्यक्रम में पं. नरेन्द्रदत्त आर्य, श्री मूलशंकर, श्री रमेश चन्द्र स्नेही, श्रीमती जिमना देवी, श्री उम्मेद सिंह विशारद आदि ने भी अपनी-अपनी भजनों की प्रस्तुतियां दी। इसी के साथ वैदिक साधन आश्रम की पर्वत व वनों में स्थित दूसरी इकाई में आयोजित सत्संग समाप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन बहुत भव्यता एवं कुशलता से प्रसिद्ध आर्य विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी, आर्य वानप्रस्थ आश्रम, हरिद्वार ने किया। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य