लघुकथा – थप्पड़ का कमाल

बचपन में थप्पड़ शायद सबने खाए होंगे, पर थप्पड़ की गूंज भी होती है, यह हमें सबसे पहले बताया डॉक्टर डैंग ने 1986 की सुभाष घई की फ़िल्म कर्मा में, जब दिलीप कुमार के थप्पड़ का जवाब अनुपम खेऱ ने कुछ यूं दिया:
“डॉक्टर डैंग को आज पहली बार किसी ने थप्पड़ मारा है..फर्स्ट टाइम..इस थप्पड़ की गूंज सुनी तुमने..इस गूंज की गूंज तुम्हें सुनाई देगी…पूरी ज़िंदगी सुनाई देगी.”
उसके बाद सियासी थप्पड़, रोमांटिक थप्पड़, सड़क छाप थप्पड़, बुलबुल पांडेय का थप्पड़ सबकी गूंज सुनाई देने लगी. थप्पड़ कमाल का भी होता है, यह बताया महान क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर ने.
”मुझे महान क्रिकेटर या कि क्रिकेट का भगवान कहा जाता है, उसका श्रेय जाता है मेरे गुरु और कोच रमाकांत आचरेकर की मेहनत और अपनी लगन को,” सचिन तेंडुलकर का मानना है, ”बल्कि मैं तो यह कहूंगा, कि इसका श्रेय जाता है मेरे गुरु के उस थप्पड़ को, जो मेरे गुरु ने मुझे लगाया था.”
”थप्पड़ और आपको?” श्रोता का हैरान होना स्वाभाविक था.
”मैं भी तो आखिर सबकी तरह बच्चा ही था न! वह थप्पड़ न लगता, तो अब तक बच्चा ही रहता.” सचिन ने सहजता से कहा.
”ऐसा क्या था उस थप्पड़ में?” श्रोता की हैरानी बढ़ती जा रही थी.
”यह थप्पड़ ही तो मेरी कामयाबी का राज है!” सचिन की आंखों में एक चमक दिखाई दी.
”पर थप्पड़ लगा क्यों?” असल बात तो यही है.
”अब नादानियां की तो थप्पड़ तो पड़ना ही था न! हुआ यह कि मेरे लिए असली क्रिकेट की शुरुआत तब हुई जब मैं 11 साल का था. मेरे भाई को मुझमें कोई प्रतिभा नजर आई और वह मुझे आचरेकर सर के पास ले गए. मेरे विकास में उनके साथ गुजारे वो चार-पांच साल मेरे लिए काफी अहम रहे. आचरेकर सर पेड़ के पीछे खड़े होकर हमारा खेल देखा करते थे और बाद में हमारी गलतियां बताया करते थे. वे हमारे अभ्यास के लिए कुछ मैच ऑर्गनाइज करवाया करते थे. वह सामने वाली टीम को बता देते थे कि मैं चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करूंगा.’ सचिन की आंखों में आचरेकर सर के लिए दो अश्रु बिंदु थे.
”ऐसे ही एक दिन मैच खेलने के बजाए मैं वानखेड़े स्टेडियम में शारदाश्रम इंग्लिश मीडियम और शारदाश्रम मराठी मीडियम के बीच हैरिस शील्ड का फाइनल देखने चला गया. मैं अपनी टीम का हौसला बढ़ाने वहां गया था. मैंने वहां सर को देखा और उन्हें मिलने चला गया. उन्हें पता था कि मैं मैच खेलने नहीं गया लेकिन उन्होंने फिर भी पूछा कि मैंने कैसा प्रदर्शन किया. मैंने उन्हें बताया कि मैं मैच छोड़कर अपनी टीम का हौसला बढ़ाने यहां आया हूं. इतना सुनना था कि उन्होंने मुझे एक जोरदार थप्पड़ लगाया. मेरे हाथ का लंच बॉक्स छूट कर दूर गिरा. सारा सामान फैल गया.” सचिन अभी भी अश्रुपूरित नैनों से आचरेकर सर को ढूंढ रहे थे.
”उस समय सर ने मुझे कहा था, ‘तुम्हें दूसरों के लिए तालियां नहीं बजानी हैं. ऐसा खेलो कि लोग तुम्हारे लिए तालियां बजाएं.” सचिन ने कहा.
”उस दिन के बाद मैंने काफी मेहनत की और घंटों प्रैक्टिस करता रहा. अगर उस दिन ऐसा नहीं होता तो शायद मैं स्टैंड में बैठकर लोगों की हौसल अफजाई ही करता रहता. यह थप्पड़ का ही कमाल था.”
सचिन तेंडुलकर के 87 वर्ष के कोच और द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता रामाकांत आचरेकर नए साल 2019 का स्वागत करके दुनिया को अलविदा कह गए.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।