बौद्धिकता के नाम पर वैचारिक प्रदूषण

हमारे देश में एक विशेष जमात हमारी परम्पराओं और धार्मिक मान्यताओं पर निरंतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुठाराघात करने में लगी रहती हैं। इस वर्ग विशेष के अनेक नाम हैं जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ता, एक्टिविस्ट,सिविल सोसाइटी, शहरी नक्सली, साम्यवादी, सेक्युलर, टुकड़े-टुकड़े गैंग, NGO वाला आदि। परन्तु इनका एक ही उद्देश्य है “तोड़फोड़”। समस्या यह है कि उनके इस प्रयासों से कुछ हिन्दू युवा भ्रमित हो नास्तिक बन जाते हैं। यही यह जमात चाहती है। इस लेख में हम ऐसी ही इनकी एक शरारत को उजागर करेंगे। हिंदुस्तान टाइम्स अंग्रेजी समाचार ,मुंबई संस्करण में दिनांक 10/2/2019 को सरस्वती पूजा के उपलक्ष में दीपांजना पाल का लेख प्रकाशित हुआ। लेख में लेखिका ने अपनी विकृत मानसिकता का परिचय देते हुए यह लिखा है कि कथाओं के अनुसार पितृसत्तात्मक हिन्दू समाज में सरस्वती देवी के रूप में पुरुष देवताओं जैसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश को चुनौती देती हैं। लेख में अपने बचपन के कुछ अनुभवों को प्रस्तुत करने के बाद लेखिका जबरन खींचतान कर यह लिखती है कि सरस्वती के नाम पर दक्षिणपंथी हिन्दुओं में कोई उत्साह नहीं हैं। पुरे लेख में लेखिका ने न तो उस कथा का कोई वर्णन किया जिसके आधार पर उन्होंने सरस्वती देवी के विद्रोही होने का निष्कर्ष निकाला हैं। न ही यह लिखा कि उसे दक्षिणपंथी हिन्दू कैसे नापसंद करते हैं। केवल अपनी पूर्वाग्रह भरी मानसिकता का परिचय दिया। इस लेख में हम वैदिक मान्यता के अनुसार सरस्वती, ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि नामों पर प्रकाश डालते हुए लेखिका के मानसिक खोखलेपन को उजागर करेंगे।
१. वेद हिन्दू समाज ही नहीं अपितु समस्त विश्व के लिए सार्वभौमिक, सर्वकालिक और सर्वग्राह्य धर्मग्रंथ हैं। सरस्वती, ब्रह्मा, विष्णु शिव आदि नाम चारों वेदों के विभिन्न मन्त्रों में आये हैं। इसलिए इन नामों का उद्गम वेद से होना माना गया हैं।
२. वेदों के प्रकांड पंडित स्वामी दयानन्द ने वेदों में विशुद्ध एकेश्वरवाद अर्थात ईश्वर एक है और उन्हें अनेक नामों से जाना जाता हैं। यह सिद्ध किया है।
वेदमंत्रों में ईश्वर के एक होने के अनेक प्रमाण हैं। जैसे
ऋग्वेद
1. जो एक ही सब मनुष्यों का और वसुओ का ईश्वर है [ऋग्वेद 1/7/9]।
2. जो एक ही हैं और दानी मनुष्य को धन प्रदान करता है [ऋग्वेद 1/84/6] ।
3. जो एक ही हैं और मनुष्यों से पुकारने योग्य है [ ऋग्वेद 6/22/1] ।
यजुर्वेद
1. वह ईश्वर अचल है, एक है, मन से भी अधिक वेगवान है [यजुर्वेद 40/4]।
अथवर्वेद
1. पृथ्वी आदि लोकों का धारण करने वाला ईश्वर हमें सुख देवे,जो जगत का स्वामी है, एक ही है, नमस्कार करने योग्य है, बहुत सुख देने वाला है [अथवर्वेद 2/2/2]।
2. आओ, सब मिलकर स्तुति वचनों से इस परमात्मा की पूजा करो, जो आकाश का स्वामी है, एक है, व्यापक है और हम मनुष्यों का अतिथि है [अथवर्वेद 6/21/1]।
3. वह परमेश्वर एक है, एक है, एक ही है, उसके मुकाबले में कोई दूसरा , तीसरा, चौथा परमेश्वर नहीं है, पांचवां, छठा , सातवाँ नहीं है, आठवां, नौवां, दसवां नहीं है, वही एक परमेश्वर चेतन- अचेतन सबको देख रहा है [अथवर्वेद 16/4/16-20]।
३. ईश्वर के असंख्य नाम है? ईश्वर के अनेक नाम इसलिए है क्यूंकि ईश्वर के अनेक गुण हैं। ईश्वर के असंख्य गुण होने के कारण भी ईश्वर के असंख्य नाम सिद्ध होते हैं। सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में स्वामी दयानन्द ने अनेक नामों की व्याख्या की हैं। जैसे
-जिस को विविध विज्ञान अर्थात् शब्द, अर्थ, सम्बन्ध प्रयोग का ज्ञान यथावत् होवे, इससे उस परमेश्वर का नाम ‘सरस्वती’ है।
-चर और अचररूप जगत् में व्यापक होने से परमात्मा का नाम ‘विष्णु’ है।
-जो सम्पूर्ण जगत् को रच के बढ़ाता है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘ब्रह्मा’ है।
-जो कल्याणस्वरूप और कल्याण का करनेहारा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम ‘शिव’ है।
अत: अनेक ईश्वर होने और उनके आपस में लड़ने की बात केवल एक मिथक सिद्ध होती हैं। जब ईश्वर एक ही है पर अनेक नाम वाला हैं। तो यह कोरी कल्पना ही सिद्ध हुई।
४. ईश्वर के तीनों लिंगों में नाम हैं। एक ही ईश्वर के पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंग तीनों लिंगों में नाम हैं। जब सभी नाम एक ही ईश्वर के हैं तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसे नामों को पितृसत्तात्मक और सरस्वती, लक्ष्मी, देवी आदि को मातृसत्तात्मक के रूप में विभाजित करना केवल मानसिक दिवालियापन हैं।
५. ईश्वर की परिभाषा को जानने से ऐसी सभी भ्रांतियों का निवारण सरलता से हो जाता हैं।
ईश्वर – जिसके गुण, कर्म,स्वभाव और स्वरूप सत्य ही हैं। जो केवल चेतनमात्र वस्तु है तथा जो एक अद्वितीय, सर्वशक्तिमान निराकार सर्वत्र व्यापक अनादि और अनंत आदि सत्यगुण वाला है और जिसका स्वभाव अविनाशी, ज्ञानी, आनंदी, शुद्ध न्यायकारी, दयालु और अजन्मा आदि है। जिसका कर्म जगत की उत्पत्ति, पालन और विनाश करना तथा सर्वजीवों को पाप, पुण्य के फल ठीक ठीक पहुँचाना हैं। उसको ईश्वर कहते है। -स्वामी दयानन्द
यह लेख यही दर्शाता है कि साम्यवादी मानसिकता ईश्वर, ईश्वर की परिभाषा, ईश्वर की गुण,कर्म और स्वभाव आदि किसी भी विषय पर कुछ नहीं जानते। ये केवल कचरा फैलाना जानते हैं। क्यूंकि इनका उद्देश्य मार्गदर्शन करना नहीं अपितु भटकाना हैं। इसलिए इनसे सावधान रहे और जहाँ भी ये मिले इनके बौद्धिक प्रदुषण से सबको सचेत करते रहे।