कविता

जाने क्यों

आंखे तालाब नहीं पर भरती है जब रोते हैं
बीज नहीं है दुश्मनी फिर भी लोग बोते हैं
ऐसे ही मिसाल कई जीवन में मिल जाते हैं
होठ कपड़ा नहीं है फिर भी सिल जाते हैं
दिल शीशा तो नहीं फिर भी न जाने क्यों टूटे
किस्मत सखी नहीं है फिर भी न जा क्यों रूठे
बुद्धि कोई लोहा नहीं फिर भी जंंग इसमें लगता है
इंसान कोई मौसम नहीं फिर जाने क्यों बदलता है

विक्रम कुमार

विक्रम कुमार

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