अतीत की अनुगूंज -1

भारत छोड़ने के बाद मैंने अध्यापन में पुनः अपना भाग्य बनाया। पहले दस वर्ष लंदन के उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में गणित पढ़ाया परन्तु फिर गणित पढ़ाने से मन भर गया। मैं हरेक विषय पढ़ना चाहती थी। हरेक कला में हाथ ज़माना चाहती थी। अतः प्रारंभिक शिक्षा के क्षेत्र में जगह मिलते ही मैंने गणित से पलायन कर लिया। यहां मैं उन्मुक्त रूप से अपने को व्यक्त कर सकती थी।
पहली कक्षा पढ़ाने का अवसर आया। उस वर्ष की क्लास काफी छोटी थी। उम्र में भी यह 22 बच्चे 4 और 5 वर्ष के बीच थे। इसे पुराने भारतीय हिसाब से कच्ची पहली कहा जायेगा। जनवरी में यह बच्चे रिसेप्शन की श्रेणी से ऊपर चढ़ा दिए जाते हैं। फिर अगले वर्ष सितम्बर में स्कूल शुरू होने पर पक्के पहली के बच्चे कहलाते हैं। इस प्रकार इनको कुछेक अधिक समय मिल जाता है।
क्रिस्टोफर सबसे तेज और चंचल था। सबसे छोटा भी वही था, आयु में भी और कद में भी। उसका रंग लाली लिए हुआ गोरा था, बाल मेहंदी के रंग के किंचित घुंघराले और चहरे पर भूरे तिलों के छपके। ऐसे लोगों को जिंजर कहा जाता है। मज़ाक में उसके दोस्त उसे ड्यूरसेल कहते थे। कारण यह कि ड्यूरासेल बैटरी के सैल जो टोर्च आदि में डाले जाते हैं, सर की तरफ से तांबे के रंग के होते हैं। इस नाम से वह चिढ़ता था या कहें उसे बहाना मिल जाता था मार पीट करने का। चिढ़ने से अधिक वह मज़ा लेता था। बोलती तो उसकी अनवरत हवा का हिस्सा थी। उसे चुप कराकर बच्चो को पढ़ाना टेढ़ी खीर था।
आवाज़ ऊंची करना भी अध्यापिकाओं के लिए वर्जित है। सजा आदि का तो प्रश्न ही नहीं उठता था।
हमेशा वह क्रेग के पास बैठता। क्रेग की मौसी मेरी असिस्टेंट रह चुकी थी। क्रेग घुन्ना और चुप था। मगर उसके हाथ सदा अकुलाते रहते थे क्रिस्टोफर को छेड़ने के लिए। अलग बैठाऊँ तो वह माने ना। अतः मैंने क्रिस को बहलाया और कहा तुम मेरे सबसे तेज दिमाग बच्चे हो। चलो मैं तुमको मॉनिटर बना देती हूँ आओ मेरी कुर्सी पर आधे में तुम बैठो और हम मिलकर सबको पढ़ाएंगे। इसपर वह मान गया। अब उसे अपने संग दुबका कर मुझे अपना काम करना होता। मगर फिर भी। …
उसकी तीव्र बुद्धि से कुछ ऐसे वाक्य निकलते की हंसी रोकना भी मुश्किल हो जाता। एक दिन झगड़े के बाद इसी तरह उसे परचा कर अलग किया तो प्रतिद्वंदी बालक ने शिकायत की कि मैं उसकी तरफदारी करती हूँ। क्रिस्टोफर झट बोला, हाँ क्योंकि वह मुझको चाहती है। अगर मैं इंडियन होता तो उससे शादी कर लेता।
ओफ़ ! इतना तो मैं उस दिन भी नहीं लजाई थी जिसदिन ससुराल वाले मुझे पसंद कर गए थे। और अब ? कहाँ मैं 45 वर्ष की और कहाँ यह 4-5 वर्ष का। उस दिन उसकी माँ से पहली बार मैंने शिकायत की क्रेग के साथ निरंतर पंगेबाजी की। प्रधान अध्यापिका ने कहा दोनों को अलग करने के लिए माँ से सहमति लेनी पड़ेगी क्योंकि नन्हें बच्चे मानसिक आघात सह नहीं पाते।
माँ, जेनेट केवल 22 वर्ष की अनब्याही माँ थी। उसका स्वयं का चरित्र अभी पूर्ण परिपक्व नहीं हुआ था शायद। बोली- क्रेग की माँ से पूछकर बताऊंगी। क्रेग की मौसी लेज़्ली अगले ही दिन आई और मुझसे अपील की कि इनको इनके हाल पर छोड़ दो। दोनों मायें बहुत रोई हैं। वह भी अभिन्न सखियाँ रही हैं बचपन से। मैं समझा दूँगी।
इसके बाद दोनों में थोड़ा ठहराव आ गया। मेरी बारी थी उस सत्र की कला नृत्य आदि की सभा करने की। मेरे बच्चों की प्रतिभा का प्रदर्शन करना था। मुझे शौक था नाटक का। इक्तेफ़ाक़ से एक कहानी की किताब रद्दी की टोकरी में मिल गयी जो भारत से सम्बंधित थी। अब उसका त्याग इसलिए किया गया था क्योंकि उसकी भाषा काफी शब्दबहुल थी पर जब मैंने पढ़कर सुनाई तो बच्चों को पसंद आई। तीन चार बार उन्होंने उसको सुनाने की फरमाइश की। मैंने उसे अपने शो के लिए चुन लिया। कहानी एक काली चिड़िया की थी जिसकी पत्नी को राजा बंदिनी बना लेता है। चिड़ा बेचारा उसे छुड़ाने के लिए हर संभव प्रयत्न करता है। अंत में निराश होकर वह स्वयं राजा के दुर्ग की ओर चल पड़ता है। रस्ते में वह जो मिलता उसकी मदद करता। इस प्रकार उसने कई मित्र बना लिए जो उसके संग ही चल पड़े। अंत में उन सबने राजा की दुरूह शर्तों को अपनी सामर्थ्य अनुसार पूरा किया और चिड़ा अपनी प्रियतमा को छुड़ा लाया।
कहानी में अनेक किरदार थे इसलिए मेरी पूरी क्लास भाग ले सकती थी। मैं किरदारों का आवंटन करने लगी। छूटते ही क्रिसटोफेर बोला मैं बनूँगा काला चिड़ा। उतनी ही तेजी से मेरे मुंह से निकला ” वॉट विद देम जिंजर हेयर ?” सब हंस पड़े। और क्रिस का मुंह लटक गया। कहानी की पुस्तक मेरे हाथ में थी क्रमवार मैंने सब किरदार चुन लिए. क्रिस ने सोंचा समझा और चिल्लाया कैन आई बी द किंग ? मेरी हंसी ही न रुकी। बहुत प्यार से कहा हाँ जरूर क्यों नहीं। मगर बात यहीं नहीं ख़तम हुई। अगले दिन उसने फरमाइश की कि राजा की एक रानी भी होती है न ? हाँ होती तो है। तो फिर मैं अपनी रानी खुद चुनूंगा। हाँ भाई चुन ले। रेचेल बन सकती है। रेचेल उससे बलिष्ट भर लम्बी थी मगर क्रिस को निराश करना मेरे वश में नहीं था।
ड्रेस रिहर्सल का दिन आया। स्कूल के खजाने में से एक लाल शनील का लंबा चोला उसको पहना दिया गया मगर मुकुट देखकर वह बोला कि सब जानते हैं कि यह क्रिसमस की ड्रेस है। मैं इंडियन किंग बना हूँ।
वह था इतना छोटा कि कपडे मिलने मुश्किल। पर मेरा मन नहीं माना। रात को सब काम धंधे निपटाकर मुकुट बनाने बैठी। कॉर्न फलैक्स के डिब्बे को काटा। पन्नी कहाँ धरी थी घर में। बैडरूम में मेरी अलमारी। पति सो चुके थे। दबे पाँव अलमारी खोली, कतरनों की पिटारी निकाली। राम कृपा से एक गुलाबी ब्रोकेड का टुकड़ा मिल गया। चमकता लूरेक्स। उसे गोंद से गत्ते के मुकुट पर मढ़ा। रंगीन सितारे चिपकाए। चुन्नी में लगनेवाली सुनहरी किनारी बर्बाद की। मुकुट में जड़ी। मोर का पंख लगाया। अगले दिन क्रिस्टोफर ने पहना। ड्रामा सफल रहा। क्रिस्टोफर की अदाकारी ने बाजार लूट लिया।
उसको मैंने अपनी ज़री की चुन्नी भी बाँधी थी। बाद में सब बच्चे कपडे उतारकर अपनी क्लास में जा बैठे। क्रिस का पता नहीं। अस्सिस्टेंट को भेजा तो पाया की वह रो रहा था। क्या हुआ भला। माँ उसे समझा रही थी किसी बात पर। मेरी अस्सिस्टेंट ने बताया कि वह मुकुट नहीं उतारना चाहता। मैंने कहा उसे दे दो। बड़ी कोशिश से जेनेट ने उतारा और घर ले गयी। तब उसको तसल्ली हुई।
इस अति मेधावी चतुर बालक का वास्तविक जीवन सहज नहीं था। एक दिन पी टी की क्लास के बाद जब सब बच्चे कपडे उतारकर कूद फांद के लिए तैयार हो रहे थे तो देखा उसकी ऊपरी बांह पर जले का गोल निशान था। यह निशान सिगरेट से जल जानेपर बन जाता है। मैंने पूछा यह कैसे जला। वह मुंह लटका कर बोला ओह ये जेनेट के बॉय फ्रेंड ने किया है। मगर अगले ही क्षण वह अन्य बच्चो के संग खेल कूद में व्यस्त हो गया। मैंने बात प्रधान तक पहुंचा दी। जेनेट को बुलाया गया। उसने कहा कि यह गलती से हो गया। जब वह सोफे पर लेटा सिगरेट फूंक रहा था तब क्रिस्टोफर उससे छेड़खानी कर रहा था। मैंने क्रेग की मौसी लेज़्ली को बताया तो वह निराश सी बोली, क्या पता जेनेट ठीक कह रही हो। वह बहुत भोली है। अभी 22 वर्ष की है। उसको अपना जीवन भी तो जीना है। भुला दो सब कुछ। बेकार सोशल वर्कर्स लफड़ा करेंगी। बच्चा भी छीन सकती हैं।
पता नहीं कहाँ होगा वह। तीस वर्ष गुजर गए।

— कादम्बरी मेहरा

परिचय - कादम्बरी मेहरा

नाम :-- कादम्बरी मेहरा जन्मस्थान :-- दिल्ली शिक्षा :-- एम् . ए . अंग्रेजी साहित्य १९६५ , पी जी सी ई लन्दन , स्नातक गणित लन्दन भाषाज्ञान :-- हिंदी , अंग्रेजी एवं पंजाबी बोली कार्यक्षेत्र ;-- अध्यापन मुख्य धारा , सेकेंडरी एवं प्रारम्भिक , ३० वर्ष , लन्दन कृतियाँ :-- कुछ जग की ( कहानी संग्रह ) २००२ स्टार प्रकाशन .हिंद पॉकेट बुक्स , दरियागंज , नई दिल्ली पथ के फूल ( कहानी संग्रह ) २००९ सामायिक प्रकाशन , जठ्वाडा , दरियागंज , नई दिल्ली ( सम्प्रति म ० सायाजी विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी एम् . ए . के पाठ्यक्रम में निर्धारित ) रंगों के उस पार ( कहानी संग्रह ) २०१० मनसा प्रकाशन , गोमती नगर , लखनऊ सम्मान :-- एक्सेल्नेट , कानपूर द्वारा सम्मानित २००५ भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान हिंदी संस्थान लखनऊ २००९ पद्मानंद साहित्य सम्मान ,२०१० , कथा यूं के , लन्दन अखिल भारत वैचारिक क्रान्ति मंच सम्मान २०११ लखनऊ संपर्क :-- ३५ द. एवेन्यू , चीम , सरे , यूं . के . एस एम् २ ७ क्यू ए मैं बचपन से ही लेखन में अच्छी थी। एक कहानी '' आज ''नामक अखबार बनारस से छपी थी। परन्तु उसे कोई सराहना घरवालों से नहीं मिली। पढ़ाई पर जोर देने के लिए कहा गया। अध्यापिकाओं के कहने पर स्कूल की वार्षिक पत्रिकाओं से आगे नहीं बढ़ पाई। आगे का जीवन शुद्ध भारतीय गृहणी का चरित्र निभाते बीता। लंदन आने पर अध्यापन की नौकरी की। अवकाश ग्रहण करने के बाद कलम से दोस्ती कर ली। जीवन की सभी बटोर समेट ,खट्टे मीठे अनुभव ,अध्ययन ,रुचियाँ आदि कलम के कन्धों पर डालकर मैंने अपनी दिशा पकड़ ली। संसार में रहते हुए भी मैं एक यायावर से अधिक कुछ नहीं। लेखन मेरा समय बिताने का आधार है। कोई भी प्रबुद्ध श्रोता मिल जाए तो मुझे लेखन के माध्यम से अपनी बात सुनाना अच्छा लगता है। मेरी चार किताबें छपने का इन्तजार कर रही हैं। ई मेल kadamehra@gmail.com