रंगो का त्योहार होली

इधर भी रंग, उधर भी रंग,
जिधर देखूँ रंग ही रंग,
हर किसी के ऊपर छाया रंगों का त्योहार।

पूछे जब कोई किसी से कुछ क्वेश्चन,
तब चारों ओर से एक ही आवाज़ आये,
आज़ है रंगो का त्योहार होली।

रह गया बस नाम का ही अब यह तो,
कुछ हाथों में लिये अरमानों के रंग,
आधुनिक दिखावे की परम्परा का निशान है रंग।

इस नवयुग के रंग का कुछ समय है ऐसा आया,
एक छोटे से बच्चे को भी रंगो का महत्व समझ ना आया,
आज़ दिखता कुछ है और होता कुछ है।

हमने पूछा आज़ होली का रंग फीका क्यों है?
समय वो दूर नहीं दोस्तों जब रंग खो देगा पहचान अपनी,
सिमटकर रह जायेंगे बस सब आँखों में ही।

मेरा क्या है दोस्तों, बातों पर ना मेरी जाना,
मन ना भी करे तो भी रंग ज़रूर डालूँगी,
क्योंकि मोबाइल उठा सेल्फ़ी तो ले ही डालूँगी।।

और क्या फ़र्क़ पड़ा मुझको भी बतलाना,
होली आज़ भी वैसी ही है जैसी कल थी,
बस कुछ दूरियों में नज़दीकियाँ छिपी बैठी हैं।।

मौलिक रचना
नूतन गर्ग (दिल्ली)

परिचय - नूतन गर्ग

दिल्ली निवासी एक मध्यम वर्गीय परिवार से। शिक्षा एम ०ए ,बी०एड०: प्रथम श्रेणी में, लेखन का शौक