सामाजिक

जूते !

बचपन की एक बात याद हो आई। गाँव में एक गरीब चर्मकार हुआ करता था।  वोह शराब बहुत पीता था। शराब पी कर वोह अक्सर कीचड़ में गिर जाता था । गांव के कुछ लोग कहते, ” इस को जूते में पानी डाल कर पिलाओ, इस का नशा उत्तर जाएगा “, एक औरत को मिर्गी का दौरा पढता रहता था और उस को होश में लाने के लिए जूता, उस की नाक के नज़दीक ला कर उस को सुंघाते थे, मिर्गी से आराम आता था या नहीं, मुझे पता नहीं लेकिन उस बात को ले कर आज मैं जूतों के बारे में सोचने लगा कि इन जूतों का हमारी ज़िंदगी से कितना गहरा संबंध है। भारत में रहते हुए जूतों के बारे में जानने को बहुत कुछ मिलता है। आज तो बचपन से ही बच्चों को जूते पहना दिए जाते हैं लेकिन अपनी बात करूँ तो बहुत साल तक हम जूतों के बगैर ही गाँव में घूमते रहते थे। पैरों में कांटे चुभ जाते लेकिन हम कांटे से काँटा निकाल लेते। कुछ खून निकलता लेकिन इस की हमें कोई परवाह नहीं होती थी। हमारे पैर बहुत सख्त होते थे, ईंटों से ठोकरें लगती रहती थीं लेकिन हमें कोई परवाह ही नहीं होती थी। उस समय गाँव के कुछ चर्मकार जूते बनाया करते थे और गाँव में चल फिर कर जूते बेचा करते थे और तीन चार रूपये इस की कीमत होती थी। यह चर्मकार, गाँव के मरे हुए पशुओं की चमड़ी उतारते थे और इस से किसी ढंग से चमड़ा बनाते थे और खुद ही इस के जूते बनाते थे।  मुझे याद है जब पहली दफा मेरे दादा जी ने मुझे जूते ले कर दिए थे। इस को उस वक्त धौड़ी की जूती कहते थे क्योंकि यह बिलकुल ही साधाहरण चमड़े से गांव में ही बनी हुई होती थी। जब यह पहनते तो कुछ देर बाद पैरों को काटने लगती थी और एड़ी पर छाले पढ़ जाते थे। जैसे जैसे हम बड़े होते गए हमारे जूतों के स्टाइल में भी फर्क आने लगा और आज कितनी कम्पनीआं अच्छे अच्छे डिज़ाइनों में पम्प शूज़ ट्रैक शूज़ और डीजाइनर शूज़ बगैरा बना रही हैं की इन की कीमत भी कुछ सौ रूपये से ले कर लाखों रूपये तक जाती है।

इतने मँहगे महँगे जूते होने के बावजूद भी जूतों को बहुत नीचा समझा जाता है क्योंकि यह शरीर पर सब से नीचे पैरों में होते हैं ।  यही कारण है कि जब हम किसी धर्म अस्थान में प्रवेश करते हैं तो जूते बाहर ही उतार देते हैं। यहाँ तक कि भारत में पुराने ज़माने में एक परम्परा होती थी कि शूद्र लोग जब गाँव में दाखल होते थे तो जूते उतार कर हाथ में पकड़ लेते थे। आज भी जूते को इतना नीचे समझा जाता है कि मनचले लड़कों को अक्सर लड़कीआं जूता उतार कर उस के मुँह पर मारने की धमकी देती हैं। जूतों से पीटना बहुत बेइज़ती भरी बात समझा जाता है। जूते मार मार सर गंजा करने की धमकी हम सब ने सुनी है। इराक की लड़ाई के बाद जब एक दफा जॉर्ज बुश पत्रकारों से बातें कर रहा था तो किसी ने उस के मुँह की ओर जूता फेंका था और आज तो लगता है जैसे जूता फेंक कर किसी की बेइज़ती करना ट्रेड मार्क ही बन गया है क्योंकि जॉर्ज बुश के बाद बहुत सिआसतदांओं की ओर जूते फेंके गए। भारत में तो औरत को ही पैर की जूती समझा जाता था। आज इतने महँगे महँगे फैशनेबल जूते होने के बावजूद भी इन को नीचे का अस्थान ही मिला हालांकि यह हमारे शरीर का जरूरी अंग है। इस के बगैर हम बाहर जा ही नहीं सकते बल्कि अपने घर में भी चपल पहन कर चलते हैं। अपनी बात कहूं तो मेरे पास भी घर से बाहर जाने के और जूते, घर में ही चलने फिरने के लिए और, बैड रूम के लिए और और गार्डन में जाने के लिए और। सोचता हूँ कि इतने जूतों की किया जरूरत तो एक ही बात समझ आती है, ” ज़माना बदल गया ”

जूतों के इतहास को जानना भी असम्भव काम है। भारत की बात करें तो हज़ारों साल पहले भारत में ज़्यादा लोग नंगे पाँव ही चलते थे और धार्मिक लोग लकड़ी के खड़ांव पहनते थे। बचपन से ले कर बुढ़ापे तक नंगे पाँव घूमने से पैर बहुत सख्त हो जाते थे। यह मैंने अपने बचपन में भी देखा था कि गाँव के बहुत लोग जब कहीं दूर किसी गाँव को जाते थे तो जूते अपनी लाठी में फंसा कर लाठी को अपने कंधे पर रख लेते थे। इस के दो कारण थे, एक तो दूर पैदल चल कर पैरों में छाले होने से बचाव हो जाता था और दूसरे जूते इतने घिसते नहीं थे। इस का कारण उस समय गरीबी ही था क्योंकि जूते खरीदना भी उन की समरथा में नहीं होता था। मेरे दादा जी ने बताया था कि जब उन्होंने साइकल खरीदा था तो उस वक्त गाँव में दो चार साइकल ही थे और दादा जी का यह साइकल मैंने भी चलाया था और इस पर ही मैंने साइकल चलाना सीखा था। साइकल आने के बाद पैदल चलना कम हो गिया और अब तो साइकल की जगह मोटर साइकल और कारों ने ले ली है . जूतों के बारे में मैंने इतहास को जान्ने की कोशीश की लेकिन इस का सही इतहास मलूम करना अत्यंत कठिन काम है।  फिर भी जितना मैंने जाना, उस में यह ही मलूम हुआ की इतहास्कारों को जूतों के चालीस हज़ार साल पहले का इतहास पता चला है और यह भी पता चला है कि चीन और जपान जैसे देशों में बचपन से ही टाइट जूते पहना दिए जाते थे ताकि उन के पैर ज़्यादा बड़े न हो जाएँ। औरतों के बड़े पाँव बुरा माना जाता था । इस से पहले का इतहास जानना इस लिए भी मुश्किल है की जूतों का इतनी देर तक रहना मुश्किल है . बहुत देशों में खुदाई के समय, उस वक्त के लोगों के जूते मिले हैं। यह भी पता चला है कि अक्सर लोग नंगे पाँव ही चलते थे लेकिन बहुत दफा जंगलों में और आर्कटिक जैसे बर्फीले इलाकों में लोग पैरों को बचाने के लिए दरख्तों के पत्ते बाँध लेते थे। कुछ लोग लंबे लंबे घास को पैरों के नीचे रख कर ऊपर को बाँध लेते थे। इस से ही आगे चल कर किसी जानवर की खाल को पैरों के नीचे रख का तस्मे जैसी रस्सीआं बना कर ऊपर को बाँध लेते थे। किसी दरख्त की छील उतार कर उस को पैरों के नीचे रख कर ऊपर को बाँध लेने के सबूत भी मिले हैं लेकिन जूतों का बहुत पुराना इतहास जानना इस लिए भी मुश्किल है कि घास , चमड़ा और ऐसी चीज़ें जैसे किसी दरख्त की छील ज़िआदा समय रह नहीं सकती।

जैसे जैसे सभयताएँ उनत करती गईं, पैरों को ज़्यादा से ज़्यादा बचाने की कोशिश भी होती गई। आर्मीनिआ में साढ़े पांच हज़ार पहले के जूते मिले हैं जो नीचे से ऊपर को इकठा करके ऊपर को तस्मों की तरह बंधा हुआ है। इसी तरह स्पेन में कुछ रस्सिओं के बने सैंडल मिले हैं जो पांचवीं छठी सदी के बने हुए हैं। मिस्र के लोग क्योंकि गर्म रेगिस्तानी इलाके में रहते थे, इस लिए वहां सैंडल बनने शुर हुए लेकिन इस का इतहास जानना बहुत कठिन है। पहले पहल लडाइओं में सिपाही नंगे पाँव ही लड़ा करते थे लेकिन धीरे धीरे सिपाहीओं के लिए जरूरत के हिसाब से जूतों के डिज़ाइन बनने लगे। सिकंदर की फ़ौज में ख़ास तरह के जूते होते थे लेकिन ज़्यादा तर सिकंदर के सिपाही नंगे पाँव ही लड़ते थे और जूतों के साथ लड़ना उन को मुश्किल लगता था और जूतों को बेकार समझा जाता था । रोमन सिपाहीओं के जूते भी इंग्लैंड में मिले हैं जो बिलकुल ही अजीब शक्ल के हैं। पुरातन समय में लड़ाईआं तलवार और ढाल के साथ लड़ी जाती थीं और नंगे पाँव लड़ना आसान होता था। बादशाह और अमीर लोग तो जूते पहनते थे लेकिन आम लोगों की पहुँच से यह दूर होता था। यूरपीन देशों में वीओपारिक रुझान बढ़ने से जूतों को बनाने के लिए कारीगर आगे आये। इन लोगों ने जूतों को बनाने के ढंग सोचे। पहले पहले जूते के ऊपर के हिस्से को निचले हिस्से से कील से जोड़ते थे। धीरे धीरे मोटे धागे से सीने का रुझान बड़ा। इंडस्ट्रियल रेवोलुशन में मशीने आ गईं जिस से जूते को सीने का काम शुरू हुआ। और आज तो यह काम भी ग्लू से जोड़ कर ही कर दिया जाता है। आज तरह तरह के जानवरों की खाल से जूते बनाये जाते हैं जो बहुत महंगे विकते हैं।

आज तो जूते इतने अच्छे अच्छे बन गए हैं कि बड़ी बड़ी दुकानों के शो रूम में जाकर ही मन खुश हो जाता है। खेल के मैदान के लिए इलग्ग इलग्ग किस्म के जूते बन गए हैं। बाल रूम डांस के लिए इलग्ग, फ़ुटबाल खेलने के इलग्ग, रेस में भाग लेने के इलग्ग, मिल्ट्री, इन्डस्ट्रीअल बूट जिस में लोहे की टो होती है याने हर फ्रोफेशन के लिए फुटवेअर इज़ाद हो गए हैं। कहीं भी जूते पहन लें लेकिन इनकी जगह नहीं बदली, शरीर के नीचे ही रहते हैं और इनकी औकात नहीं बदली। अभी भी जूते मारकर, किसी की बेइज़ती करना नहीं बदला।

परिचय - गुरमेल सिंह भमरा लंदन

१९६२ में बीए फाइनल की पढ़ाई छोड़ कर इंग्लैण्ड चले गए. लन्दन में निवास कर रहे हैं. किताबें पढने और कुछ लिखने का शौक बचपन से ही रहा है। पिछले १३ वर्ष से रिटायर हैं और बोलने में कठिनाई की समस्या से पीड़ित हैं. पांच वर्ष से रेडिओ एक्सेल बर्मिंघम को कहानियाँ भेज रहे हैं. 'जय विजय' के लिए लघु कथाएँ लिखते हैं. संस्मरण लिख रहे हैं.

6 thoughts on “जूते !

  1. आदरणीय दादा जी, सादर प्रणाम. भरत और राम की खड़ाऊं की गाथा रामायण का महत्वपूर्ण प्रसंग है. शादियों में जीजा के जूते छुपा लेना फिर नेग वसूलना, फिर इस पर फिल्म का गाना बनना, शोले फिल्म में संजीव कुमार के जूते, फिल्मों में संवाद अदायगी के बादशाह राजकुमार के सफ़ेद जूते, प्रेमचंद के फटे जूते भी कहते हैं एक कहानी, इंद्रेश जी की जूतों पर व्यंगात्मक रचना वाला ब्लॉग, सिंड्रेला के जूते, और न जाने क्या क्या। ‘जूते’ एक विस्तृत ब्लॉग कमाल की रचना है. इतनी जानकारी है जो संभवतः नामालूम थी. बहुत ही मेहनत से लिखा गया ब्लॉग, एक एक शब्द अनगिनत भावनाएं बयान करता हुआ, बहुत ही बेहतरीन ब्लॉग है. बचपन में एक कथा पढ़ी थी जिसमें फ़टे जूते को ठिकाने लगाना भी रोचक बन गया था, आजकल तो पुराने जूते देकर नए बर्तन देने वाले भी हैं, एक मनोविज्ञान और भी है, जब भी शोरूम में जूते लेते हैं तो भलीभांति हाथों में उठाकर, परख कर, देखते हैं, पर एक बार जूते हमारे पैरों में जुत गए तो उससे दूर के सम्बन्ध हो जाते हैं, गुजरात में तो दुकानों में जाने से पूर्व जूते बाहर निकालने पड़ते हैं, मंदिरों में तो यह होता ही है. बूट पालिश जैसी सामाजिक फिल्म ने झंझोड़ कर रख दिया था, बहुत सी रोचक बातें आपके ब्लॉग ने याद दिला दी हैं. मोची जूतों से प्रेम करता है. दिल्ली में एक मोची महोदय हैं जो सड़क किनारे बैठते हैं और उन्होंने लिख रखा है ‘जूतों का डॉक्टर’. मोची फिल्म भी बनी. जानकारीपूर्ण और रोचक ब्लॉग के लिए हार्दिक आभार.

    1. सुधर्ष्ण जी, आप ने बहुत अछे से जूतों के बारे में बताया . जूतों का हमारी जिंदगी से गहरा सम्बन्ध है .इन के बगैर तो हमारा गुज़ारा ही नहीं है .इन के साथ बहुत दिलचस्प बातें जुड़ी हुई हैं . जैसे आप ने बताया, मनचलों की मुरम्त से ले कर जीजा साली का मजाक और रोजी रोटी के लिए मोची से ले कर बड़े बड़े कारपोरेट तक के काम, जिन से लाखों की रोजी रोटी चलती है लेकिन इतना होने के साथ साथ इन को पैरों के नीचे ही जगह मिली है, शायद इस लिए की इन से बुरे लोगों की मुरम्त करनी पढ़ती है .बहुत बहुत धन्यवाद सुध्र्ष्ण जी .

  2. जूते की बहन चप्पल की करामात-
    मुंबई एयरपोर्ट पर यात्री ने चप्‍पल में छिपा रखा था 11 लाख का सोना
    यात्री की चप्पल से 11,12,139 रुपये का सोना जब्त किया गया है। यात्री राहत अली बुधवार की रात उड़ान संख्या G 8-056 के जरिए बहरीन से मुंबई पहुंचा था। इस सोने को उसने चप्‍पल की सोल के अंदर रखा था।

    1. चपल बदनाम हुई, डार्लिंग तेरे लिए ! हा हा हा

  3. बहुत बहुत धन्यवाद लीला बहन . रात को ही कुछ याद आया और सोचा इस पर कुछ लिख दूँ . अप ने इसे सराहा, मैं निश्चिंत हो गिया कि इतना बुरा नहीं लिखा गिया . फिर से बहुत बहुत धन्यवाद लीला बहन .

  4. प्रिय गुरमैल भाई जी, आपने ग़ज़ब का ब्लॉग लिखा है, सचमुच आपने तो जूतों की औकात ही बढ़ा दी. इतना शोध करके आपने यह ब्लॉग लिखा है, कि हमें ऐसा लग रहा है जैसे आपने जूतों पर थीसिस ही लिख दी है. जूतों से संबंधित हर तरह की जानकारी आपके इस ब्लॉग में मिल गई. जूतों का इतिहास-भूगोल, जूतों का भूतकाल-वर्तमानकाल, जूतों की साहित्यिकता, जूतों की कीमत, सब पर आपकी पैनी कलम की धार चली है. बहुत सुंदर ब्लॉग के लिए बधाई.

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