खिलंदड़ी की चुनाव सभा

‘खिलंदड़ी की चुनाव सभा’ का बैनर देखकर हम रुक गए. रुकने का एक कारण तो चुनाव सभा के इस अजीबोगरीब नाम का होना था, दूसरे एक पुरानी-सी कार की ड्राइविंग सीट से उतरती हुई खिलंदड़ी को देखकर भी रुकना पड़ा. आप यह न समझें, कि खिलंदड़ी से हमारी पुरानी जान-पहचान थी. असल में हमने न तो खिलंदड़ी का कभी नाम ही सुना था, न कभी उससे मिले ही थे. फिर क्यों रुके? सुनिए.
यों तो हम कानों से भी डोरे हैं और आंखों से भी, ऊपर से अक्ल से पैदल, लेकिन बैनर पर खिलंदड़ी की एकदम ताज़ी तस्वीर लगी हुई देखकर हमें अनुमान लगाने में तनिक भी देर नहीं लगी कि यही खिलंदड़ी मैडम होंगी. उस पुरानी-सी कार से भी वे अकेली ही उतरी थीं, कोई लाव-लश्कर साथ नहीं था. गेट पर फूलमाला-स्वागत आदि का भी कोई इंतज़ाम नहीं था. जिज्ञासावश हम भी उनके पीछे-पीछे चल दिए. वे ओपन स्टेज पर चढ़ गईं और हम नीचे दरी पर बैठ गए.
खिलंदड़ी जी ने झट से माइक हाथ में पकड़ लिया और बोलीं-

”यहां उपस्थित और अनुपस्थित सभी महानुभावों के अंदर विराजमान आत्मस्वरूप को हमारा प्रणाम. हमारा विचार है-

”प्रार्थना और ध्यान इंसान के लिए बहुत ज़रूरी हैं,
प्रार्थना में भगवान आपकी बात सुनते हैं,
ध्यान में आप भगवान की बात सुनते हैं”.

आइए सबसे पहले अपने-अपने इष्टदेव को नमन करते हुए प्रार्थना करते हैं. (खिलंदड़ी आंखें मूंदकर गाती है, सब उसके पीछे-पीछे गा रहे हैं)-

”हे गिरधर गोपाल लाल, तू आ जा मेरे आंगना
माखन-मिश्री तुझे खिलाऊं और झुलाऊं पालना-

केसर भर के खीर पकाई, दाल-चूरमा और बाटी
माखन-मिश्री मटकी भरी है, खाना हो तो खावना
हे गिरधर गोपाल लाल, तू आ जा मेरे आंगना————–”
जब खिलंदड़ी ने आंखें खोलीं, तब तक काफी सज्जन आ चुके थे. वे हंसते हुए बोलीं-

”इतनी अधिक संख्या में उपस्थित होने के लिए मेहरबानी. कृपया आगे से ध्यान रखें. चार का मतलब है ठीक चार बजे. आपने मुझे चुनाव के लिए खड़ा किया है, तो आप यह तो जानते ही हैं, कि मेरे पास धन का अंबार नहीं है, उसकी मुझे ज़रूरत भी नहीं है. काम करने के लिए धन की नहीं, इच्छा शक्ति, मन की शक्ति और दो बाज़ुओं (यह भी आप जानते ही हैं, कि मेरी एक बाजू ऊपर नहीं उठती है, लेकिन मेरे सब काम इसी बाजू की ताकत से होते हैं—–हंसी—-) की ज़रूरत है. आपके बैठने के लिए कुर्सियों का इंतज़ाम नहीं है, मैं भी कुर्सी पर नहीं बैठ रही हूं, मुझे कोई दिक्कत नहीं हो रही, आपको हो रही है क्या?”

”बिलकुल नहीं” सबने एक स्वर में कहा.

तभी एक सज्जन ने हाथ खड़ा किया, शायद वह कुछ बोलना चाहता था. खिलंदड़ी ने कहा- ”हां जी, फरमाइए.”

”मैडम आपकी इच्छा शक्ति और मन की शक्ति से हम भलीभांति वाकिफ़ हैं. हमारे गॉर्ड ने मुझे बताया था, कि एक बार आप हमारी कॉलोनी में आई थीं. एक लिफ्ट में लगातार फैन चल रहा था, क्योंकि उसका स्विच टूट गया था, आपने तुरंत ठीक करवा दिया था”.

तभी दूसरा हाथ खड़ा हुआ. खिलंदड़ी ने इशारे से बोलने को कहा- ”मैडम एक दिन मैं सुबह सैर पर जा रहा था, मैंने देखा कि एक मेनहोल का ढक्कन टूट गया था. आपने आसपास से पेड़ की टूटी शाखाएं चुनकर घेरा बना दिया, ताकि कोई नाले में गिर न जाए और थोड़ी देर बाद उसे ठीक करवा दिया था”.

खिलंदड़ी ने हंसते हुए कहा- ”यह सब तो हम जानते हैं, ऐसे नेक काम तो आप में से भी बहुत लोग करते होंगे. आप लोग अपनी-अपनी समस्याएं बताइए, ताकि मैं अपना चुनाव का लक्ष्य और एजेंडा तय कर सकूं. फ़ालतू के वादे मैं नहीं करना चाहती.”

एक-एक कर सबने अपनी-अपनी समस्याएं बताईं. तभी एक सज्जन ने कुछ पूछने की अनुमति मांगी. उसने पूछा-

”मैडम, हमें मालूम है, कि आप जब 5 साल की थीं, तभी मामूली-से बुखार ने आपकी बाजू को पोलियोग्रस्त कर दिया था, आपने कभी विकलांगता प्रमाणपत्र और आरक्षण की मांग नहीं की?”

हंसते हुए खिलंदड़ी ने कहा ”भाई, आपका यह प्रश्न हमें बहुत अच्छा लगा. असल में बात यह है, कि ”हमारे विचार में “आरक्षण” एक तरह की “खैरात” या “भीख” ही है. जिस तरह हमने “विकलांग” की जगह “दिव्यांग” शब्द को मान्यता दे दी, मेरा मानना है कि उसी तरह “आरक्षण” की जगह “खैरात” या “भीख” कर दिया जाय, तो निश्चित ही बहुत-से स्वाभिमानी लोग इसका मुद्दा नहीं उठाएंगे, है कि नहीं? ” (उन्मुक्त हंसी–). ”और जिनमें स्वाभिमान नहीं है, वह इंसान कहलाने का अधिकारी भी नहीं है.” (पुनः उन्मुक्त हंसी–).
खिलंदड़ी ने पूछा-”आप लोग भीख या खैरात लेना चाहेंगे? सब चुप, लेकिन खिलंदड़ी की उन्मुक्त हंसी की गूंज ज़िंदाबाद. ”एक बात और कहना चाहूंगी, मुझे वोट दोगे और जिताओगे, तो मेरे साथ आपको भी कंधे-से-कंधा मिलाकर चलना पड़ेगा, काम करना पड़ेगा. कारण स्पष्ट है. सरकार हमें लुटाने के लिए तो पैसा देगी नहीं, जितना दे सकेगी उतना ही देगी. इसलिए हम सब मिलकर योजना बनाकर उसी सीमित धन से आगे बढ़ेंगे और काम करेंगे.”

एक व्यक्ति की जिज्ञासा थी- ”मैडम, आपको खिलंदड़ी नाम कैसे मिला?”

”भाई, या में कछु बड़ो राज नहीं है. बात-बात में मेरी हंसी छूट जावै, तभी सब लोग मनैं खिलंदड़ी कह देवैं. सच पूछें तो, इसी हंसी से मोकों काम करबा की ताकत मिलै छै.” (उन्मुक्त हंसी के साथ अपनी देसी बोली सुनकर तालियां भी गड़गड़ा उठती हैं–).

अत्यंत सौहार्दपूर्ण माहौल में सवाल-जवाब का दौर चलता रहा, कि सभा का नियत समय समाप्त हो गया. खिलंदड़ी ने हंसते-हंसते कहा- ”आज की सभा को टेम है गयो, अब आगे थारी मर्जी है. जैसे हमने गिरधर गोपाल लाल से कही ”खाना हो तो खावना”, वैसे ही थारी मर्जी पर है ”मनें वोट पाना हो तो पावना”. जय श्री कृष्ण.

(इसी के साथ खिलंदड़ी मैडम ओपन स्टेज से कुर्सी उठाकर दाहिनी बाजू पर लाद ली (बांईं बाजू तो ऊपर उठती ही नहीं), और स्टेज से उतर गईं. कुछ लोग दरियां समेटने लगे. एक सज्जन ने स्टेज से मेज और माइक समेट-संभाल लिया. बाकी सब धीरे-धीरे निकलते गए. ऐसी सहज और अद्भुत चुनाव सभा को मन में समेटे हम भी सभा-स्थल से बाहर निकले और खिलंदड़ी मैडम को उस पुरानी-सी कार स्टार्ट करते अगली ”खिलंदड़ी चुनाव सभा में जाते देखा.)

पुनश्च-

चुनाव सभाओं के बाद हुए चुनावों के परिणाम जानने को आप उत्सुक होंगे. खिलंदड़ी मैडम अब एम एल ए हैं. उनके पहनावे, रहन-सहन और बोलहाल में कोई फ़र्क नहीं आया है. आज भी वे पहले की तरह रोज़ सवेरे सैर करने के बाद दाहिने कंधे पर फल-सब्ज़ी और दूध का थैला लादे जाती हुई दिखती हैं. जनता के सब काम पूरे हो चुके हैं. सरकार द्वारा मिले सीमित धन से सब काम हो जाने के बाद भी पर्याप्त धन शेष बचा है, अब खिलंदड़ी मैडम ने जगह-जगह खूबसूरत पार्क बनवा दिए हैं. पार्क में बच्चों-बड़ों के लिए जिम की सुविधा भी है. जनता खिलंदड़ी मैडम से बहुत खुश है. सरकार ने भी उन्हें सर्वश्रेष्ठ एम एल ए की पदवी से नवाज़ा है. खिलंदड़ी मैडम ने किसी भी जगह या बेंच पर अपना नाम नहीं लिखवाया है. उन्होंने जगह-जगह लिखवा रखा है-

”अच्छे काम करते रहिए,
चाहे लोग तारीफ़ करें या न करें,
आधी से ज्यादा दुनिया सोती रहती है,
‘सूरज’ फिर भी उगता है.
और रोशनी बांटता है”.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।