बेरहमी

”आप सब यहां किसलिए आए हैं?” सभी पर्यटकों ने चारों ओर देखा, कोई दिखाई नहीं दिया. वही आवाज फिर आई, तो गाइड ने कहा- ”यह आवाज बावड़ी से आ रही है.”
”बावड़ी! कौन बावड़ी?”
”अरे यही चांद बावड़ी, जिसे देखने आप सब आए हैं.”
”यहां की बावड़ी भी बोलती है?” पर्यटक हैरान थे.
”जेठ की लू से राजस्थान की तपती धरा, बरसात का देर से और कम होना, सूखे की संभावना, बावड़ी के इर्द-गिर्द इतना भीड़-भड़क्का, तो बावड़ी को भी तो गर्मी लगती होगी न! वह अपनी व्यथा किसी से तो कहेगी न!”
”आप मुझे देखने आए हैं, तो मेरी विशेषताएं भी जान लीजिए. मुझे आज से करीब 1200 साल पहले राजा चांद ने बनवाया. उन्होंने पानी की कीमत जानी. उनकी दूरदर्शिता के कारण मुझे भारतीय शिल्पकारी के अद्भुत नमूने वाली साढ़े तीन हजार सीढ़ियों वाला 100 फीट गहरा बनवाया गया. जिस व्यक्ति को बावड़ी के भीतर से पानी निकालना होता था तो उसे पहले साढ़े तीन हजार सीढ़ियां नीचे जाना पड़ता था. मुझ में जमा किया गया पानी एक साल तक स्थानीय लोगों की जरूरतें पूरी करता था.” पर्यटक यह सब सुनकर हैरान थे. जो व्यक्ति साढ़े तीन हजार सीढ़ियां नीचे जाकर ऊपर पानी लाएगा, उसे पानी की कीमत अच्छी तरह मालूम होगी!
”आप लोगों ने जैसे मेरी नगरी आभा नगरी यानी रोशनी की नगरी का नाम बिगाड़कर आभानेरी कर दिया है, वैसे ही नदियों और बावड़ियों को खंडहर बना दिया है. भला हो राकेश राठौर का जिसने उत्तर प्रदेश की सरायन नदी को पुनर्जीवित कर दिया और नमन है तमिलनाडु के वेल्लोर जिले की उन महिलाओं को जिनके सम्मिलित प्रयास ने नागनदही नदी को कूड़े-कचरे का डंपिंग ग्राउंड होने से बचा लिया.”
”क्या यह बावड़ी सही कह रही है? हम लोग प्रकृति के प्रति इतने बेरहम हो गए हैं, कि नदी को कूड़े-कचरे का डंपिंग ग्राउंड बना देते हैं?”
”आज तक तो बावड़ी की गवाही सच ही निकली है, तभी तो यह अभी तक मानव की बेरहमी बची हुई है.” कहकर गाइड ने उनको वापिस चलने का इशारा किया.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।