“मरा नहीं है जोश”

चन्द्रयान पर उतरना, एक कदम था दूर।
किन्तु जरा सी चूक से, हुआ देश मजबूर।।

विफल हुए तो क्या हुआ, मरा नहीं है जोश।
अन्तरिक्ष विज्ञान का, पास हमारे कोश।।

चन्द्रयान की विफलता, अन्तिम नहीं पड़ाव।
और अधिक है बढ़ गया, अब तो चन्द्र-जुड़ाव।।

एक विफलता से नहीं, मानेंगे हम हार।
जग को फिर विज्ञान का, बाँटेंगे उपहार।।

अनजान सी राह थी, अनजाना परिवेश।
पायेंगे खोये हुए, फिर से हम सन्देश।।

बन्द नहीं हमने किये, आशाओं के द्वार।
अभी और सम्भावना, खोज रही सरकार।।

सदा हार के बाद ही, मिल जाती है जीत।
कोशिश करने से मिले, फल भी आशातीत।।

हर छत्ते में तो नहीं, होता है मकरन्द।
चन्द्रविजय के मिशन का, काम न होगा बन्द।।

जारी हैं कोशिश अभी, लायेंगी वो रंग।
जीवित अपना हौसला, कभी न होगा भंग।।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

परिचय - डॉ रूपचन्द शास्त्री 'मयंक'

एम.ए.(हिन्दी-संस्कृत)। सदस्य - अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग,उत्तराखंड सरकार, सन् 2005 से 2008 तक। सन् 1996 से 2004 तक लगातार उच्चारण पत्रिका का सम्पादन। 2011 में "सुख का सूरज", "धरा के रंग", "हँसता गाता बचपन" और "नन्हें सुमन" के नाम से मेरी चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। "सम्मान" अब तक दूसरों को ही सम्मानित करने में संलग्न हूँ। सम्प्रति इस वर्ष मुझे हिन्दी साहित्य निकेतन परिकल्पना के द्वारा 2010 के श्रेष्ठ उत्सवी गीतकार के रूप में हिन्दी दिवस नई दिल्ली में उत्तराखण्ड के माननीय मुख्यमन्त्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा सम्मानित किया गया है▬ सम्प्रति-अप्रैल 2016 में मेरी दोहावली की दो पुस्तकें "खिली रूप की धूप" और "कदम-कदम पर घास" भी प्रकाशित हुई हैं। 2017 में मेरी दो पुस्तकें "ग़ज़लियात-ए-रूप" और बाबा नागार्जुन के संस्मरणों पर आधारित पुस्तक "स्मृति उपवन" भी प्रकाशित हो चुकीं हैं। -- मेरे बारे में अधिक जानकारी इस लिंक पर भी उपलब्ध है- http://taau.taau.in/2009/06/blog-post_04.html प्रति वर्ष 4 फरवरी को मेरा जन्म-दिन आता है