अतीत की अनुगूंज – 8 : अभागा बचपन

उस वर्ष प्ले ग्राउंड का सबसे शरारती बच्चा था एडवर्ड। बेहद सुन्दर , काले घुंघराले बाल। गोरा रंग और चमकती चंचल आँखें। बात बात पर उसकी किसी न किसी से मुठभेड़ हो जाती। हरदम मैं उसको ऑफिस के बाहर सज़ा में बैठा हुआ पाती।  जब लंच की छुट्टी ख़तम होती तब उसको क्लास में वापिस भेज दिया जाता।  वैसे क्लास में वह अन्य बच्चों की तरह ही काम करता।
        दूसरों से उसकी इतनी शिकायतें मिलतीं कि एक महीने बाद ही मुझे उसकी फाइल निकलवानी पडी। सब उसपर समस्यात्मक व्यवहार का ठप्पा लगवाना चाहते थे।  मुझे वह इतना बुरा नहीं लगता था।  उसकी लड़ाई वगैरह अधिक खिलंदड़ेपन के कारण थी।  लगता था कि उसपर माँ बाप का नियंत्रण कम है।  बहुत शिकायतों के कारण मुझे कारण तो ढूंढना ही था।  पर वह अपने आप ही साफ़ हो गया।
        एक दिन एडवर्ड देर से स्कूल आया तो मैंने अलग बैठा कर कारण पूछा।  जरा रुक- रुक कर उसने बताया कि उसकी बड़ी  बहन आई थी और वह उसकी माँ के सारे पैसे चुराकर ले गयी जिससे माँ बेचारी उस दिन का खाना भी न खरीद पाई। एडवर्ड ने केवल चाय में डुबोकर बासी सूखी डबलरोटी की पीठें खाईं।  बहन ने घर की चाभियाँ बनवा ली थीं और जब माँ अस्पताल गयी हुई थी तब वह सारा खाने का सामान चुराकर ले गयी।
      ”  एडवर्ड तुम्हारी माँ अस्पताल क्यों गयी ? ”  मैंने पूछा।
      ” उसे जाना पड़ता है। सुई लगवाने।  और खून देने।  ”
     ” तुमको पता है क्यों ? ”
     ” नहीं मगर वह बहुत बूढी है। मैं जाऊँ ? जेसन मेरी बाट  देख रहा है। ”
खिड़की के कांच से जेसन उसको इशारे कर रहा था।  घर जाते समय वह जेसन की माँ के साथ ही जाता था। जेसन की माँ ने करीब सात या आठ बच्चों को स्कूल से घर तक ले जाने का काम ले रखा था।  सुबह शाम की ड्यूटी से वह सोलह पौंड हफ्ता बना लेती थी।  उस ज़माने में यह एक मोटी  रकम थी।  मैंने एडवर्ड को जाने दिया।  शाम को मैंने जेसन की माँ से मिलने का समय लिया। वह बच्चों को उनके घर छोड़कर वापिस आ गयी।
       एडवर्ड की माँ ,  की कहानी सुनाई उसने।  एडवर्ड की माँ लुईसा  आयरलैंड से शरणार्थी बन कर आई थी अपने माँ बाप के संग।  बड़ी होते होते इंग्लैंड की खुली संस्कृति में वह आयरलैंड के कैथोलिक संस्कार भूल बैठी और केवल पंद्रह वर्ष की आयु में माँ बन गयी तो उसके पिता ने उसे घर से निकाल फेंका।  अभी वयस्क नहीं हुई थी अतः सरकारी आवास में रख दी गयी।  वहीँ सरकारी भत्ते से उसने अपनी बेटी का पालन पोषण किया।  अठारह की होने पर उसको एक कमरे का फ्लैट मिल गया परन्तु आमदनी का कोई रास्ता नहीं था। नन्हीं  सी बेटी उसका एकमात्र भावनात्मक सम्बन्ध थी।  चढ़ती उम्र ,कोई अंकुश नहीं। उसकी सुंदरता पर मरनेवालों की कमी नहीं थी।  एक से दूसरा ,दूसरे से तीसरा। कई आये मगर उसकी बेटी जेनी  को अपनाने में कोई समर्थ नहीं था क्योंकि सब कच्ची उम्र के वयस्क छात्र आदि ही होते थे।  मर मर के जीती रही। टूट टूट कर फिर फिर बनती रही।  जब बेटी स्कूल जाने लगी उसको मजदूीरी की नौकरी मिल गयी।  वह शांति से रहने लगी।  पुरुषों से दूर हो गयी।  उसकी बेटी पढ़ाई तो क्या ही करती। जैसे तैसे रसोई के काम की ट्रेनिंग लेकर किसी होटल में लग गयी।  तभी उसको एक सहकर्मी से प्रेम हो गया। वह दिन दिन भर गायब रहती। जब रात को आती तो माँ उसे डांटती।  जवान औरत कब सह पाए अपनी इच्छाओं का दमन ? हार कर माँ ने कहा कि शादी कर ले मैं कुछ नहीं कहूँगी। सो उसी वर्ष उसने शादी कर ली। वह बीस की हुई थी।  जेनी के  जाने के बाद लुईसा अकेली हो गयी। वह केवल पैतीस वर्ष की थी।  अक्सर अवसाद में रोने लगती।  यहां की संस्कृति मे  पुरुष मित्रों की कमी नहीं होती।  लुईसा अब अक्लमंदी से अपना सम्बन्ध बना सकती थी। सो वही किया। आठ दस वर्ष सब ठीक चला। फिर ४३ वर्ष की उमर में उसे दुबारा से गर्भ ठहर गया। शादी नहीं हुई थी उस आदमी से।  अतः . वह आराम से बिना बताये किनारा कर गया।  दुखियारी ने ४४ साल की अधेड़ उम्र में एडवर्ड को जन्म दिया।  बहुत बड़ी अवस्था में यह सब हुआ तो दवाएं आदि तगड़ी दी गईं।  अब एडवर्ड केवल छह वर्ष का था और वह गर्भाशय के कैंसर से मर रही थी।
        उधर बेटी का सम्बन्ध विच्छेद हो गया। बच्चा भी कोई नहीं हुआ था।  माँ को फलता फूलता देख कर वह उसी से खार खाने लगी।  अपने नैराश्य में वह माँ को दण्डित करके खुश हो लेती थी।  लुईसा ने कभी उसकी शिकायत नहीं की। वरना पुलिस उसको मानसिक रोगी घोषित करके जेल या पागलखाने में भेज सकती थी।  जेनी का वश चलता तो वह एडवर्ड को मार ही डालती मगर लुईसा चट्टान की तरह खड़ी रही।
          जेसन की माँ ने बताया कि एक दिन ऐसा भी होगा कि एडवर्ड सुबह उठेगा तो बगल में माँ मरी हुई पडी होगी।
मेरा दिल दहल गया ऐसी व्यथा सुनकर।  एडवर्ड पर मेरी कृपा और भी तगड़ी  हो गयी।  प्लेग्राउंड की परिचारिकाएं मुझसे नाराज़ भी हुईं। उनका कहना था कि सभी बच्चे अपनी अपनी पार्श्वभूमि को ढो रहे हैं मगर स्कूल का शिष्टाचार सबको बराबर निभाना जरूरी होता है।  मुझे भी उसको बरजना चाहिए। दया और कोमलता से बच्चे सही सन्देश नहीं ले पाते। उनको बराबर से समाज में रहना पड़ता है।  इसी दया के चक्कर में एडवर्ड बिगड़ा है।
         खैर ! क्रिसमस आनेवाली थी।  तभी एडवर्ड ने बताया कि उसकी बहन फिर से उसका सामान चोरी कर ले गयी।  तंग करने के लिए इस बार उसने एडवर्ड के कपडे जूते बस्ता आदि चुरा लिए। माँ घर पर ही थी। रसोई में काम कर रही थी। बैडरूम की खिड़की खुली थी। अतः वह उसी से अंदर दाखिल हुई और माँ और  एडवर्ड का सामान उठा ले गयी।  अगले दिन जेसन की माँ ने एडवर्ड को साबुत कपड़ों में तैयार किया।  भोला बालक शान से सबको बताता रहा कि आज मैंने जेसन के कपडे पहने हैं।
        अपने बच्चों के लिए मैंने कपडे खरीदे तो उसके लिए भी दो जोड़ी ले लिए।  चुपके से प्रधान आचार्या  के माध्यम से उसको दिलवाये।  इसके अतिरिक्त बची हुई ऊन से एक मोटा जम्पर भी बिना क्योंकि बच्चे खेलते समय कोट आदि उतार देते हैं।  जम्पर उसको बहुत प्रिय था।  क्रिसमस की पार्टी वाले दिन मैंने अपना पुराना  क्रिसमस ट्री सजाकर क्लास में रखा। सभी बच्चों से पन्नी की चैन बनवाई। उनके द्वारा बनाये गए कागज़ और गत्ते  के खिलौने उसपर लटकाये।  वैसे स्कूल के प्रांगण या हॉल में एक बड़ा सा ट्री लगाया जाता है।
        पार्टी के बाद स्कूल बंद हो जाता है दस दिन के लिए।  सबको बाय बाय कहते समय एडवर्ड एक तरफ खड़ा रहा।  मैंने पूछा ,कुछ बात है क्या। वह चुप रहा।  मैंने फिर पूछा कुछ चाहिए क्या। वह बोला  कि उसके घर क्रिसमस ट्री नहीं है।  मैंने उसे समझाया कि इतना बड़ा ट्री अगर मैं उसको दे भी दूँ तो घर तक कैसे वह ले जा पायेगा।  मगर मेरी सहायिका ग्लोरिया तुरंत सहायता को आ गयी। उठाकर मैं पहुंचा दूँगी। कम ऑन एडवर्ड।  फिर अपने अनेकों क्रिसमस उपहारों से निकलकर मैंने उसे एक चॉकलेट का डिब्बा भी दिया।  ग्लोरिया दोनों वस्तुएं लेकर उसको घर तक छोड़ आई।
      छुट्टियां ख़त्म होने पर एडवर्ड वापिस आया तो उसने कहा मेरा घर बदल गया है। अब मैं जेसन के संग एक ही पलंग में  में सोता हूँ।  बच्चा तो बच्चा होता है।  जेसन के संग सोने में भूल गया कि वह सदा के लिए अनाथ हो गया है।
       जैसा कि अपेक्षित था ,एक दिन सुबह उसकी बगल में उसकी माँ मरी हुई मिली।  जब बहुत हिलाने डुलाने पर भी न बोली तो वह रोता  हुआ जेसन की माँ के पास गया।  उसने कैसे स्थिति को संभाला मालुम नहीं।  एडवर्ड के अनुसार उसकी माँ फिर से लम्बी देर के लिए अस्पताल में चली गयी है इसलिए वह जेसन के घर में रह रहा है। ( यू के के नियम के अनुसार सभी मृतक सरकार जब्त कर लेती है और उनका पंजीकरण करके उनका संस्कार करती है। यह एक धर्म निरपेक्ष क़ानून है। परिवार अपना सहयोग यदि  दे सकते  हैं तो देते हैं अन्यथा सरकार मुफ्त दफ़न आदि करती है।  )
          प्रधानाचार्या ने बताया कि जेसन की माँ ने एडवर्ड को कानूनी तौर पर अपने संरक्षण में  ले लिया है।  अठारह की उम्र तक वह उसके अभिभावक रहेंगे। इसलिए सरकार उनको भत्ता देगी. अब तो एडवर्ड  ३० वर्ष का हो गया होगा।  मुझको अवकाश लिए भी ज़माना हो गया।  ग्लोरिया अब इस दुनिया में नहीं है।  जेसन का परिवार कहाँ है क्या पता।  पर उसकी सहृदयता आज भी एक मिसाल है।
                                                                               — इति —
– कादम्बरी मेहरा

परिचय - कादम्बरी मेहरा

नाम :-- कादम्बरी मेहरा जन्मस्थान :-- दिल्ली शिक्षा :-- एम् . ए . अंग्रेजी साहित्य १९६५ , पी जी सी ई लन्दन , स्नातक गणित लन्दन भाषाज्ञान :-- हिंदी , अंग्रेजी एवं पंजाबी बोली कार्यक्षेत्र ;-- अध्यापन मुख्य धारा , सेकेंडरी एवं प्रारम्भिक , ३० वर्ष , लन्दन कृतियाँ :-- कुछ जग की ( कहानी संग्रह ) २००२ स्टार प्रकाशन .हिंद पॉकेट बुक्स , दरियागंज , नई दिल्ली पथ के फूल ( कहानी संग्रह ) २००९ सामायिक प्रकाशन , जठ्वाडा , दरियागंज , नई दिल्ली ( सम्प्रति म ० सायाजी विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी एम् . ए . के पाठ्यक्रम में निर्धारित ) रंगों के उस पार ( कहानी संग्रह ) २०१० मनसा प्रकाशन , गोमती नगर , लखनऊ सम्मान :-- एक्सेल्नेट , कानपूर द्वारा सम्मानित २००५ भारतेंदु हरिश्चंद्र सम्मान हिंदी संस्थान लखनऊ २००९ पद्मानंद साहित्य सम्मान ,२०१० , कथा यूं के , लन्दन अखिल भारत वैचारिक क्रान्ति मंच सम्मान २०११ लखनऊ संपर्क :-- ३५ द. एवेन्यू , चीम , सरे , यूं . के . एस एम् २ ७ क्यू ए मैं बचपन से ही लेखन में अच्छी थी। एक कहानी '' आज ''नामक अखबार बनारस से छपी थी। परन्तु उसे कोई सराहना घरवालों से नहीं मिली। पढ़ाई पर जोर देने के लिए कहा गया। अध्यापिकाओं के कहने पर स्कूल की वार्षिक पत्रिकाओं से आगे नहीं बढ़ पाई। आगे का जीवन शुद्ध भारतीय गृहणी का चरित्र निभाते बीता। लंदन आने पर अध्यापन की नौकरी की। अवकाश ग्रहण करने के बाद कलम से दोस्ती कर ली। जीवन की सभी बटोर समेट ,खट्टे मीठे अनुभव ,अध्ययन ,रुचियाँ आदि कलम के कन्धों पर डालकर मैंने अपनी दिशा पकड़ ली। संसार में रहते हुए भी मैं एक यायावर से अधिक कुछ नहीं। लेखन मेरा समय बिताने का आधार है। कोई भी प्रबुद्ध श्रोता मिल जाए तो मुझे लेखन के माध्यम से अपनी बात सुनाना अच्छा लगता है। मेरी चार किताबें छपने का इन्तजार कर रही हैं। ई मेल kadamehra@gmail.com