कब से झील नहीं सोई है!

आँखों में बारूदी सपने सपनों में हिंसा बोई है।
कब से झील नहीं सोई है!

यहीं शिकारा अपना भी था यहीं कभी बजरे चलते थे
और शरद की रातों में हम पश्मीने ओढ़े फिरते थे
बरसों से लेकिन यह घाटी अपने में घुट कर रोई है।
कब से झील नहीं सोई है!

इस जमीन के चप्पे-चप्पे में साँसों की गंध मिलेगी
और पसीने में पुरखों के प्राणों की सौगंध मिलेगी
मगर सियासत के फंदे में जैसे गौरैया सोई है।
कब से झील नहीं सोई है!

यही स्वर्ग था यही नरक है जिये-मरे में नहीं फरक है
कैसे हो उपचार व्याधि का संशय में जब स्वयं चरक है
कितनी बार कली फूलों की खिलने से पहले रोई है।
कब से झील नहीं सोई है!

— ओम निश्चल

(रेखाकृति : प्रभात पाण्डेय)