खट्ठा-मीठा : बड़े लेखक

वे हिन्दी के बड़े लेखक हैं। कम से कम स्वयं को ऐसा ही मानते हैं। उन्होंने हिन्दी साहित्य की बड़ी सेवा की है। अनेक रचनायें दी हैं, जो इधर-उधर कई पत्र-पत्रिकाओं की शोभा बढ़ा चुकी हैं। वैसे जब भी उनकी कोई रचना किसी सम्पादक के पास पहुँचती है, वह पत्रिका की शोभा बढ़ाये या न बढ़ाये लेकिन सम्पादक का रक्तचाप अवश्य बढ़ा देती है।
इसका कारण यह है कि उनका भाषा ज्ञान बहुत उच्च कोटि का है, ठीक वैसे ही जैसे उच्च कोटि के प्राणी वे खुद हैं। वे अपनी भाषा स्वयं विकसित करते हैं। वे भाषा में व्याकरण के नियमों को अपने ठेंगे पर रखते हैं। क्रियाओं में एक वचन-बहुवचन का भेदभाव वे नहीं करते। लिंग भेद में उनका बिल्कुल विश्वास नहीं है। विराम, अर्धविराम और अन्य चिह्नों का मनमाना प्रयोग करना या न करना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है।
उनके शब्दों की वर्तनी भी अपने आप में विलक्षण होती है। वे उ और ऊ की मात्राओं में अन्तर नहीं करते एवं इ और ई की मात्राओं को एक दृष्टि से देखते हैं। शब्दों में सही स्थान पर अनुस्वार लगाना उनकी शान के खिलाफ है। यों कृपा करके वे कहीं भी अनुस्वार चेंप देते हैं। ‘मे’, ‘में’ और ‘मैं’ उनकी दृष्टि में एक ही हैं। वे ‘हे’, ‘है’ तथा ‘हैं’ में भेदभाव बिल्कुल नहीं करते। वे ‘कि’ और ‘की’ को एक समान समझते हैं और समझते रहेंगे। अब सम्पादक और प्रूफ की जाँच करने वाले अपना सिर धुनते हैं तो धुनते रहें, पर उन्होंने कभी न सुधरने का बीड़ा उठाया हुआ है।
लेकिन उनकी महानता पर सन्देह करने का कोई कारण नहीं है। वे महान लेखक थे, हैं और बने रहेंगे। भाषा शास्त्री उनकी रचना देखकर अपना माथा पीटते हैं तो पीटें उनकी बला से।
— बीजू ब्रजवासी
कार्तिक कृ 13, सं 2076 वि (25 अक्तूबर 2019)