अमन की राह

”पापा, आपको पता है कि मुझे बचपन में सांस से संबंधित बीमारी है, फिर भी आप पराली जलाना बंद नहीं कर रहे!” 45 एकड़ जमीन पर खेती करने वाले अपने पिताजी से 6 साल की अमनदीप कौर ने कहा.
”क्या करूं, बता बेटी!” पिताजी सोच में पड़ गए.
”आपको पता है न कि पराली जलाने से हवा में प्रदूषकों की मात्रा खतरे के निशान से ऊपर पहुंच रही है और स्वास्थ्य-समस्याएं बढ़ रही हैं, फिर आप कुछ हल निकालिए न!” अमन का कहना था.
”आप यह भी जानते हैं, कि पराली को इकट्ठा करके और ऊपर पानी डाल कर बहुत बढ़िया कम्पोस्ट खाद बन सकती है, साथ ही रासायनिक खाद की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी. सब से बढ़िया बात, यह ऑर्गेनिक खेती होगी.” अमन की बात का जवाब नहीं!
”खेत में फसल के अवशेषों के निपटारे के लिए अमनदीप के पिता अब बीज बोने वाली मशीन का उपयोग शुरु कीजिए.” अमन का सुझाव था.
”उससे क्या होगा?”
”इससे खाद की जरूरत कम पड़ेगी और मिट्टी की सेहत भी सुधरेगी.”
पिता ने उसी समय से पराली जलाना बंद कर दिया. इससे खाद की जरूरत कम पड़ रही है और मिट्टी की सेहत भी सुधर रही है. उनकी देखादेखी पंजाब के संगरूर जिले के अन्य किसानों ने भी ऐसा करना शुरु कर दिया.
अमन की राह पर चलने वाली 17 साल की अमनदीप ने अब खुद खेत में मशीन से गेहूं की बुवाई करनी शुरु कर दी है.

अमनदीप ने खुद अमन की राह पर चलकर सबको अमन की राह दिखाई है.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।