भाषा-साहित्य

त्रिपुरा का भाषिक परिदृश्य

त्रिपुरा पूर्वोत्तर का छोटा पर सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण राज्य है I महाभारत तथा पुराणों में भी त्रिपुरा का उल्लेख मिलता है I ‘त्रिपुरा’ नाम के संबंध में विद्वानों में मतभिन्न्ता है । इसकी उत्पत्ति के संबंध में अनेक मिथक और आख्यान प्रचलित हैं । कहा जाता है कि राधाकिशोरपुर की देवी त्रिपुरसुंदरी के नाम पर त्रिपुरा का नामकरण हुआ । यह एक आम धारणा है कि राज्य का नाम “त्रिपुर सुंदरी” के नाम पर पड़ा है I त्रिपुरसुंदरी इस भूमि की संरक्षिका देवी हैं I इसे हिंदुओं की 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है । विद्वानों के एक वर्ग की मान्यता है कि मिथकीय सम्राट त्रिपुर का राज्य होने के कारण इसे त्रिपुरा का अभिधान दिया गया । कुछ विद्वानों का अभिमत है कि दो जनजातीय शब्द ‘तुई’ और ‘प्रा’ के संयोग से ‘त्रिपुरा’ बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘भूमि’ और ‘जल’ का मिलन स्थल । तुई – प्रा का विकृत रूप तिपरा और तिपरा का विकृत रूप त्रिपुरा हो गया है I ‘राजमाला’ के अनुसार त्रिपुरा के शासकों को ’फा’ उपनाम से संबोधित किया जाता था जिसका अर्थ ‘पिता’ होता है I त्रिपुरा के शासकों को मुगलों के बार- बार आक्रमण का सामना करना पड़ा I 19 वीं शताब्दी में महाराजा वीरचंद्र किशोर माणिक्य बहादुर के शासनकाल में त्रिपुरा में नए युग का सूत्रपात हुआ I उनके उत्तराधिकारियों ने 15 अक्टूबर 1949 तक त्रिपुरा पर शासन किया I इसके बाद यह भारत संघ में शामिल हो गया I त्रिपुरा एक प्राचीन हिन्दू राज्य था और 15 अक्टूबर 1949 को भारत संघ में विलय से पहले 1300 वर्षों तक यहाँ महाराजा शासन करते थे I राज्यों का पुनर्गठन होने पर 01 सितम्बर 1956 को त्रिपुरा को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया I उत्तर-पूर्व पुनर्गठन अधिनियम 1971 के अनुसार 21 जनवरी 1972 को इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया । उन्नीस आदिवासी समूह त्रिपुरा के समाज को वैविध्यरपूर्ण बनाते हैं जिनमें प्रमुख हैं – त्रिपुरी, रियांग, नोआतिया, जमातिया, चकमा, हलम, मोग, कुकी, गारो, लुशाई, संताल, भील, खसिया, मुंडा इत्यादि । बंगला और कोकबोरोक त्रिपुरा की राजभाषा है । शिक्षा के क्षेत्र में यहाँ त्रिभाषा सूत्र लागू है जिसके अंतर्गत अध्ययन का क्रम इस प्रकार है :
1.बंगला, अंग्रेजी, हिंदी या लुशाई प्रथम भाषा के रूप में I
2.बंगला या अंग्रेजी द्वितीय भाषा के रूप में I
3.सातवीं और आठवीं कक्षा में हिंदी या संस्कृत और नवीं तथा दसवीं कक्षा में संस्कृत, पाली, अरबी, फारसी या हिंदी तृतीय भाषा के रूप में I कक्षा एक से दसवीं तक शिक्षा का माध्यम सामान्यतः बंगला है I राज्य की सेवाओं में भर्ती परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी और बंगला है I राज्य की सेवाओं में प्रवेश के लिए राज्य की राजभाषाओं का ज्ञान अनिवार्य नहीं है I यहाँ अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं जिनमें बंगला, कोकबोरोक, चकमा, लुशाई, मुंडारी, गारो, कुकी प्रमुख हैं I हिंदी भी व्यापक रूप से यहाँ बोली जाती है I चकमा भाषा चकमा समुदाय के लोगों द्वारा बोली जाने वाली एक इंडो-आर्यन भाषा है। असमिया, हाज़ोंग, बंगला, चटगाँव की भाषा और मणिपुर की बिष्णुप्रिया मणिपुरी और सिलहटी भाषा से इसकी समानता है। यह चटगाँव हिल ट्रैक्ट्स में दक्षिण-पूर्व बांग्लादेश में और असम, मिजोरम और त्रिपुरा में बोली जाती है। लिखने के लिए चकमा लिपि का उपयोग किया जाता है जिसे ‘अजहा पाठ’ और कभी-कभी ‘ओजोपाठ’ भी कहा जाता है । यह आधिकारिक तौर पर न तो बांग्लादेश सरकार और न ही भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है । वर्ष 2012 में त्रिपुरा सरकार ने घोषणा की कि त्रिपुरा के प्राथमिक विद्यालयों में चकमा लिपि के माध्यम से चकमा भाषा की शिक्षा दी जाएगी । चकमा बहुल क्षेत्रों में 58 प्राथमिक स्कूलों में चकमा भाषा की पढ़ाई शुरू की गई । चकमा लोगों की मान्यता है कि वे मूल रूप से तिब्बती – बर्मी परिवार से संबंधित भाषा बोलते थे, लेकिन सदियों तक चटगाँव की आबादी के संपर्क में रहने के कारण मूल चकमा भाषा पर चटगाँव की भाषा का प्रभाव पड़ा I चटगाँव की भाषा को चटगोनियन कहते हैं जो बंगला भाषा की एक बोली है । कई भाषाविद अब आधुनिक चकमा भाषा को पूर्वी इंडो-आर्यन भाषा के दक्षिण-पूर्वी बंगला शाखा का हिस्सा मानते हैं। आधुनिक चकमा भाषा में संस्कृत, पाली, प्राकृत, बंगला, असमिया, हिंदी आदि भाषाओँ के शब्दों की बहुलता है I चकमा भाषा के अनेक शब्दों का उपयोग तिब्बती, बर्मी, अहोम, थाई, बोडो, त्रिपुरी भाषाओँ के समान है I प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक जी. ए. ग्रिअर्सन ने चकमा भाषा को ‘पूर्वी बंगला की एक उपबोली’ माना है लेकिन आधुनिक चकमा लेखकों ने ग्रिअर्सन की बातों का खंडन किया है I चकमा लेखक श्री निरंजन चकमा के अनुसार “यद्दपि चकमा और बंगला भाषाओँ में बहुत समानता और बोधगम्यता है, फिर भी उनमें से एक को हम दूसरी की बोली नहीं कह सकते I यह समानता और बोधगम्यता निश्चित और अनिवार्य रूप से लंबे समय तक सह-अस्तित्व या भौगोलिक संपर्क के कारण उत्पन्न हुई है। परंतु वास्तव में ये दोनों भाषाएँ एक कुल – परंपरा की नहीं हैं I”
गारो समुदाय के लोग गारो भाषा बोलते हैं I गारो भाषा की असम में बोली जानेवाली बोडो कछारी, राभा, मिकिर आदि भाषाओँ से बहुत समानता है। भाषिक दृष्टि से गारो भाषा तिब्बती – बर्मी परिवार की भाषा है I ग्रियर्सन ने इसे बोडो वर्ग की भाषा बताया है I हलाम समुदाय के लोग अपनी हलाम भाषा बोलते हैं I जातीय रूप से हलाम समुदाय के लोग कुकी -चिन जनजाति मूल के हैं । उनकी भाषा भी कमोबेश तिब्बती – बर्मी परिवार की तरह ही है। हलाम को ‘मिला कुकी’ के रूप में भी जानते हैं लेकिन भाषा, संस्कृति और जीवन शैली की दृष्टि से हलाम समुदाय कुकी जनजाति से बिल्कुल भिन्न है I मुंडा प्रोटो-ऑस्ट्रलॉइड जनजाति हैं। उनकी भाषा मुंडारी है जो ऑस्ट्रो-एशियाई परिवार से संबंधित है। ओरंग जनजाति के लोग टूटी-फूटी हिंदी में बात करते हैं I इनकी भाषा आस्ट्रेलियन भाषा समूह की भाषा है लेकिन त्रिपुरा में वे अपनी भाषा में बात नहीं करते हैं, वे हिंदी मिश्रित बंगला भाषा बोलने में सहज महसूस करते हैं । जातीय रूप से त्रिपुरी समुदाय भारतीय – मंगोलियाई मूल के और भाषाई रूप से तिब्बती – बर्मी परिवार के हैं । वे कोकबोरोक भाषा बोलते हैं और लिखने के लिए बंगला लिपि का उपयोग करते हैं I त्रिपुरी समुदाय का एक वर्ग बंगालियों के संपर्क में आया जिसके कारण उसकी भाषा और संस्कृति पर बंगालियों का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है I कोकबोरोक भाषा बोरोक समुदाय की मातृभाषा है I ‘कोक’ का अर्थ भाषा और ‘बोरोक’ का अर्थ ‘मनुष्य’ है I इस प्रकार ‘कोकबोरोक’ का अर्थ मनुष्य की भाषा है I पहले ‘कोकबोरोक’ को ‘तिप्रा’ कहा जाता था I बीसवीं शताब्दी में इसका नाम परिवर्तन हुआ I पहली शताब्दी से कोकबोरोक के साक्ष्य मिलते हैं जब से तिप्रा राजाओं के ऐतिहासिक अभिलेख लिखे जाने लगे । बोरोक को त्रिपुरी भी कहा जाता है I बोरोक समुदाय की नौ उपजनजातियों अथवा कुल के लोगों द्वारा कोकबोरोक भाषा बोली जाती है I ये उपजनजातियां अथवा कुल हैं – देबबर्मा, रियांग, जमातिया, त्रिपुरी, नोआतिया, कलई, मुरासिंग, रूपिनी और उचई I वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार कोकबोरोक बोलनेवालों की संख्या 8,80,537 (कुल जनसंख्या का 23.97 %) है I इस भाषा के पास गौरवमयी सांस्कृतिक परंपरा और समृद्ध लोकसाहित्य है I वर्ष 1897 में दौलत अहमद द्वारा प्रथम कोकबोरोक व्याकरण लिखा गया जिसका नाम “कोकबोरोमा” था I इसके बाद 1900 ई. में राधा मोहन ठाकुर की कोकबोरोक व्याकरण पुस्तक “कोकबोरोकमा” शीर्षक से प्रकाशित हुई I राधा मोहन ठाकुर की व्याकरण पुस्तक को त्रिपुरा सरकार ने प्रथम कोकबोरोक प्रकाशन के रूप में मान्यता दी है I कोकबोरोक त्रिपुरा में बोली जानेवाली वृहत चीनी – तिब्बती परिवार के बोडो – गारो उपवर्ग की भाषा है I पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी यह बोली जाती है I असम की बोडो, दिमासा और कछारी भाषाओं से कोकबोरोक की बहुत निकटता है I पहले कोकबोरोक की लिपि को “कोलोमा” कहा जाता था। राजरत्नाकर नामक पुस्तक मूल रूप से कोकबोरोक भाषा और कोलोमा लिपि में लिखी गई थी। बाद में दो ब्राह्मण, सुक्रेश्वर और वनेश्वर ने इसका संस्कृत में अनुवाद किया और फिर 19 वीं शताब्दी में इसका बंगला भाषा में अनुवाद किया गया । वर्ष 1979 में त्रिपुरा सरकार द्वारा कोकबोरोक को त्रिपुरा राज्य की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया । इसके बाद 1980 के दशक से त्रिपुरा के स्कूलों में प्राथमिक स्तर से उच्च माध्यमिक स्तर तक इसकी पढ़ाई होने लगी। त्रिपुरा विश्वविद्यालय में वर्ष 1994 से कोकबोरोक में सर्टिफिकेट कोर्स और 2001 में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा कोर्स शुरू किया गया । त्रिपुरा विश्वविद्यालय द्वारा वर्ष 2015 से कोकबोरोक में एम ए का पाठ्यक्रम शुरू किया गया । कोकबोरोक भाषाभाषियों द्वारा इस भाषा को संविधान की 8 वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग निरंतर की जा रही है । कोकबोरोक एक भाषा नहीं है बल्कि त्रिपुरा में बोली जाने वाली कई भाषाओं और बोलियों का मिश्रण है।

परिचय - वीरेन्द्र परमार

जन्म स्थान:- ग्राम + पोस्ट- जयमल डुमरी, जिला:- मुजफ्फरपुर(बिहार) -843107, जन्मतिथि:-10 मार्च 1962, शिक्षा:- एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें :-1.अरुणाचल का लोकजीवन(2003) 2. अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य(2009) 3.हिंदी सेवी संस्था कोश(2009) 4.राजभाषा विमर्श(2009) 5. कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय (2010) 6. हिंदी:राजभाषा,जनभाषा,विश्वभाषा (संपादन- 2013) 7.पूर्वोत्तर भारत: अतुल्य भारत, मोबाइल- 9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com

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