लघुकथा

चौथा बेटा

रामकली और फूलकली आज अपने ही घर में पराई हो गई हैं.

तीन बेटों की मां रामकली ने कभी भी तीन बेटों के होने पर गर्व नहीं किया था, लेकिन इतना भी नहीं सोचा था, कि पति रामलुभाया का शरीर शांत होते ही तीन बेटे घर को बेचकर हिस्सा-पत्ती कर लेंगे और मां-बहिन को गेहूं के बोरे की भांति इधर से उधर करते रहेंगे.

”बुजुर्गों के प्रति इतना उपेक्षा भाव पहले कहां था? कमाई-धमाई में डूबे हुए बेटे मां-बाप के बेकार होते ही उन्हें बोझ समझने लगते हैं. राम जाने क्या हो रहा है?” कुछ लोग कहते.

”यह राम का न्याय नहीं है, नई शिक्षा, नए रहन-सहन और नई व्यापारिक मनोवृत्ति का न्याय है.” कुछ और लोग कहते.

किसी के कहने से क्या होता है? कुछ नहीं, मन की पीर और घनेरी हो जाती है. रामकली और फूलकली के मन की पीर भी घनी होती जाती थी. एक-एक साल तीनों बेटों के पास रहकर सब जगह ज़िल्लत और अपमान के घूंट पीकर देख लिए थे. अब कहीं भी जाने-रहने को मन नहीं मान रहा था. दुविधा में दिन बीतता, रुदन में रैन, मन को कैसे आए चैन!

अब शायद चैन को ही इनकी तलाश थी.

”मामी जी, सुना है आप रहने के लिए किसी घर की तलाश में हैं. अगर आप अन्यथा न लें तो आप बड़ी खुशी से हमारे साथ रह सकती हैं.” रामकली के पुश्तैनी घर के पड़ोसी हरदयाल के बेटे मनोहर ने रामकली से निहोरा किया.

”किराया…”

”किराये की बात करके हमें शर्मिंदा न करें मामी जी. आपने बचपन में हमारी मां के जैसी परवरिश की है, मां-बहिन से किराया कैसा? घर आपका, हम भी आपके!” मनोहर ने बात बीच में ही काटते हुए कहा.

रामकली और फूलकली एक दूसरे को देखने लगीं. ”मामी जी, आप तीनों बेटों को आजमा चुकी हैं, एक मौका चौथे बेटे को भी देकर देख लीजिए. आपका सामान तो तैयार ही होगा, लाइए मैं ले चलता हूं.” मनोहर ने उन्हें आगे कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया.

शायद प्रभु इसी रूप में हमें उजाले की राह पर ले जाना चाहते हैं.

तमस ने उजियारे के लिए जगह खाली कर दी थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “चौथा बेटा

  1. अक्सर बच्चे वार्धक्य में अभिभावकों का सहारा बने रहते हैं, लेकिन कभी-कभी इसके उलट भी होता है. बेटे अपना कर्त्तव्य भूलकर माता-पिता को बोझ और फालतू समझने लगते हैं. वक्त कैसा भी हो, बदल जाता है और बेटियां या पड़ोसी उनका सहारा बन जाते हैं.

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