गीत/नवगीत

श्रद्धा के फूल – शहीदों की स्मृति में….

लेखनी कुछ फूल श्रद्धा के भी तुम उन पर चढ़ा दो।

जो धरा की गोद में, सब कुछ लुटाकर सो गये हैं
बीज आज़ादी के जो, अपने लहू से बो गये हैं,
जिनके कारण गंगा के, साहिल सुनाते गीत हैं,
और बरफ की वादियों में, गूँजता संगीत है,
वंदना में झुक के तुम भी, शीश को अपने नवा दो,
लेखनी कुछ फूल श्रद्धा के भी तुम उन पर चढ़ा दो।1।

सिंगार प्राची का जो कर गए, माँग के सिंदूर से
चुड़ियों के टुकड़ों को, बिखरा गये जो शूल-से
लक्ष्मण-रेखा बनाकर, आलते की धार से
कर गये जयघोष सरहद पर, प्रिया के प्यार से
आँसुओं का तुम भी उनके मोल थोड़ा सा चुका दो
लेखनी कुछ फूल श्रद्धा के भी तुम उन पर चढ़ा दो।2।

रोक ना पायी जिन्हें, लोरी की सरगम राहों में
चूमना चाहा था जिनको ले के, अपनी बाँहों में
जो फकत चरणों में अपना सिर झुकाकर चल दिए
जिनके जाने से न फिर, जल पाए आँगन में दीए
द्वार पर तुम एक दीपक, आज तो उनके जला दो
लेखनी कुछ फूल श्रद्धा के भी तुम उन पर चढ़ा दो।3।

कह के जो घर से चले थे, गुड्डा-गुड़िया लायेंगे
साथ में हम डोली और धानी चुनरिया लायेंगे
चाँद पर सेहरा लगाकर, तारों की बारात को
शांत नयनों से जो तकते, सपनों की उस रात को
आज उनके द्वार पर, शहनाई के सुर तुम सजा दो
लेखनी कुछ फूल श्रद्धा के भी तुम उन पर चढ़ा दो।4।

गीत गाओगी तो गीता जैसी पूजी जाओगी
ग़ज़ल बनकर वीरों की कुरआन में ढल जाओगी
परश पाकर दोहे नानक की ज़ुबाँ बन जायेंगे
कर्ज़ जो भी हैं शहीदों के सभी चुक जायेंगे
जायेंगेइस जनम को चाहो तुम, सार्थक अपने बना लो
लेखनी कुछ फूल श्रद्धा के भी तुम उन पर चढ़ा दो।5।

— शरद सुनेरी

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