इतिहास लेख

डाकटिकटों पर महापुरुषों के जीवन-दर्शन प्रकाशित हो

मृत्यु के बाद कृतित्व ही ‘अमर’ रहता है । साहित्यकार और वैज्ञानिक अपने कृतित्व के कारण ही अमर हैं । अपने आविष्कार ‘बल्ब’ के कारण थॉमस अल्वा एडिसन जगप्रसिद्ध हुए हैं, जगदीश चन्द्र बसु तो ‘क्रेस्कोग्राफ’ के कारण अमर हैं । आज गोस्वामी तुलसीदास से बड़े ‘रामचरित मानस’ है और ‘मैला आँचल’ है तो  फणीश्वरनाथ रेणु भी है । ऐसे कृतिकारों के जन्मस्थली भी मायने रखते हैं, पोरबन्दर कहने मात्र से महात्मा गाँधी स्मरण हो आते हैं, ‘लमही’ तो उपन्यास सम्राट प्रेमचंद के पर्याय हो गए हैं, तो ‘समेली’ अनूप साहित्यरत्न की परिधि में अंट गए हैं। कटिहार जिला (बिहार) में ‘समेली’ कोई विकसित प्रखंड नहीं है, किंतु बौद्धिकता के मामले में अव्वल है, परंतु ‘समेली’ (मोहल्ला- चकला मोलानगर)  शब्द ‘मानस-स्क्रीन’ पर आते ही एकमात्र नाम बड़ी ईमानदारी से उभरता है, वह है- “अनूप साहित्यरत्न”, जिनके जन्म 11 अक्टूबर, 1896 को हुई थी 1924 में टी. के. घोष अकादमी, पटना में और 1928 में महानंद उच्च विद्यालय में हिंदी शिक्षक नियुक्त, तो 1929 में बीकानेर के इवनिंग कॉलेज में 100 रुपये मासिक वेतन पर हिंदी व्याख्याता नियुक्त, इसी घुमक्कड़ी जिंदगी में इसी साल चांद प्रेस, इलाहाबाद से पहला उपन्यास ‘निर्वासिता’ छपवाया, वैसे अन्य विधा में से पहली पुस्तक ‘रहिमन सुधा’ थी, जो 1928 में छपी थी । उसे बिहार का प्रेमचंद भी कहा गया। कोई पिता के नाम से जाने जाते हैं, कोई दादा-परदादा के जमींदाराना ‘स्टेटस’ से पहचाने जाते हैं, किंतु यह पहचान पार्थिव देह की उपस्थिति तक ही संभव है । यह चरित्रानुसार व्यक्तिगत पहचान है, जिसे हम ‘व्यक्तित्व’ के दायरे में रखते हैं । किसी के स्वच्छ व्यक्तित्व हमें बेहद प्रभावित करता है, ऐसे व्यक्ति की खूबियाँ हमारे साथ ताउम्र जुड़ जाती हैं, परंतु इतिहास सबको सँजोकर नहीं रख पाते हैं । हाँ, ऐसे व्यक्ति अगर समाज व राष्ट्र को मानव कल्याणार्थ कुछ देकर जाता है, तो उसके इस ‘अवदान’ को हम ‘कृतित्व’ कहते हैं यानी मृत्यु के बाद यही कृतित्व ही ‘अमर’ रहता है । साहित्यकार और वैज्ञानिक अपने कृतित्व के कारण ही अमर हैं । उसे बिहार का प्रेमचंद भी कहा गया। इसलिए भारत सरकार को इस महापुरुष पर भी डाक-टिकट जारी करनी चाहिए ।

महर्षि मेंहीं और महर्षि संतसेवी परमहंस उत्तर भारत समेत नेपाल, जापान, यूएसए तक में प्रसिद्धि प्राप्त संत रहे हैं । लगभग 25 करोड़ आबादी को प्रभावित कर रहे महान संत महर्षि मेंही और उनके फैलाये संतमत-सत्संग उनके ब्रह्मलीन (निधन) के 32 वां वर्ष भी आज बिहार, झारखंड और नेपाल में जिस भाँति से फल-फूल रहे हैं, उनमें संत मेंहीं के योगदान के साथ-साथ बाद के वर्षों में उनके शिष्यों में महर्षि संतसेवी, आचार्य शाही स्वामी, आचार्य हरिनंदन बाबा, श्री दलबहादुर दास इत्यादि के अविस्मरणीय योगदान भी समादृत हैं । बिहार के मधेपुरा जिले में 1885 के वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को जन्म, पूर्णिया जिला स्कूल में पढ़ाई, तो अपने वर्गमित्र श्रद्धेय मधुसूदन पॉल ‘पटवारी’ के साथ मुरादाबाद (उ.प्र.) के संत बाबा देवी साहब से दीक्षित हो रामानुग्रहलाल से ‘मेंहीं’ बन वे कटिहार ज़िला के नवाबगंज और मनिहारी को कर्मभूमि बनाए । उनके अनन्य शिष्य महर्षि संतसेवी की कर्मभूमि भी मनिहारी रहे, जहाँ वे सद्गुरु की सेवा के साथ -साथ बच्चों को पढ़ाया भी करते थे । ‘सब संतन्ह की बड़ी बलिहारी’ केन्द्रित सब संतों के मत ‘संतमत-सत्संग’ का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार कर लोगों में झूठ, चोरी, नशा, हिंसा, व्यभिचार तजना चाहिए’ का अलख जगाये । फिर नादानुसंधान, सुरत-शब्द-योग और ध्यानयोग-साधना कर कुप्पाघाट (भागलपुर) में पूर्णज्ञान-प्राप्त किए।

कई तुलनाओं के आधार पर महर्षि मेंहीं को महात्मा बुद्ध का अवतार भी माना जाता है। आठ जून 1986 को महापरिनिर्वाण (मृत्यु) प्राप्त किये। महर्षि जी के उल्लेखनीय आध्यात्मिक-पुस्तकों में ‘सत्संग-योग’ की चर्चा चहुँओर है, यह चार भागों में है । इसे भौतिकवादी व्यक्तियों को भी पढ़ना चाहिए। महर्षि संतसेवी परमहंस संतमत के आचार्य रहे हैं और वे महर्षि मेंहीं के प्रधान शिष्य थे। उनके अमृत महोत्सव समारोह में भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी भी उनके बारे में विशद विवेचन किये हैं, जो महर्षि संतसेवी परमहंस को समर्पित अभिनंदन ग्रंथ में प्रकाशित है। भारत सरकार को गुरु-शिष्य  पर भी डाक-टिकट जारी करनी चाहिए ।

परिचय - डॉ. सदानंद पॉल

तीन विषयों में एम.ए., नेट उत्तीर्ण, जे.आर.एफ. (MoC), मानद डॉक्टरेट. 'वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' लिए गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स होल्डर, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, RHR-UK, तेलुगु बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, बिहार बुक ऑफ रिकॉर्ड्स होल्डर सहित सर्वाधिक 300+ रिकॉर्ड्स हेतु नाम दर्ज. राष्ट्रपति के प्रसंगश: 'नेशनल अवार्ड' प्राप्तकर्त्ता. पुस्तक- गणित डायरी, पूर्वांचल की लोकगाथा गोपीचंद, लव इन डार्विन सहित 10,000+ रचनाएँ और पत्र प्रकाशित. भारत के सबसे युवा संपादक. 500+ सरकारी स्तर की परीक्षाओं में क्वालीफाई. पद्म अवार्ड के लिए सर्वाधिक बार नामांकित. कई जनजागरूकता मुहिम में भागीदारी.

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