लघुकथा

कलम

”मैं कलम हूं. आजकल मेरा मशीनीकरण भी हो गया है और कलम को कर्सर कहा जाने लगा है. कितने भी मोबाइल रख लो, सूट की खूबसूरती बढ़ाने के लिए आज भी कोट की जेब में मेरे दर्शन हो ही जाते हैं. चार्जिंग खत्म हो जाए तो कर्सर की एक नहीं चलती, तब मैं ही काम आती हूं.” अपनी उपयोगिता का परिचय देती हुई कलम की विनम्रता भी दर्शनीय थी.

”मैं इतिहास लिखती हूं. आज का वर्तमान एक दिन अतीत बन जाता है और फिर इतिहास. इसलिए चाहो तो मुझे इतिहास की गवाह भी कह सकते हो.” लॉकडाउन के सन्नाटे को चीरती हुई कलम की आवाज मुखर हो गई थी. यह कलम थी या सन्नाटा या फिर स्वयं इतिहास की साक्षी! समझना मुश्किल था.

”आज के लॉकडाउन का यह सन्नाटा केवल बाहर का नहीं है, अंतर्मन का भी है. कहने को तो लॉकडाउन के कारण घर में बैठे हुए सब अपना-अपना काम कर रहे थे, पर कैद के अहसास के चलते मन का सन्नाटा निरंतर हावी है.” कलम का इतिहास-लेखन जारी था.

”व्यापार में विघ्न आने के कारण चरमराती अर्थव्यव्स्था, जॉब और स्वास्थ्य की असुरक्षा की भावना लोगों को उत्तेजित और भयभीत कर रही है, फिर भी वे यह दिखाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं, कि वे बहुत खुश हैं, उनके सुप्त सुसंस्कार जीवित हो रहे हैं, परिवेश का प्रदूषण कम हो गया है, नदियां स्वच्छ-निर्मल हो गई हैं, बर्फीले पहाड़ दिखाई देने लगे हैं, परिंदे खुशी से चहक रहे हैं, फूलों की सुंदरता बढ़ रही है और उन पर तितलियां मंडरा रही हैं, प्रकृति की खूबसूरती पूरे निखार पर है, लोगों की ईमानदारी पूरे शबाब पर है, कब के छूटे हुए शौक पूरे हो रहे हैं, लेकिन मन में सन्नाटे को चीरता हुआ सवाल है, कि ”लॉकडाउन के बाद क्या होगा और कैसे होगा!” कलम का चिंतन जारी था.

”एक और सन्नाटा भी इतिहास का हिस्सा होने बाला है. लॉकडाउन के चलते फंसे मजदूरों की बेबसी और भुखमरी, लॉकडाउन के अनुशासन की धज्जियां उड़ाते हुए असुरक्षा के अहसास के सुरक्षाकर्मियों और स्वास्थ्यकर्मियों पर पथराव और जानलेवा हमले.” कलम की संवेदनशीतता ने उसकी आंखों में नमी ला दी थी.

”तब रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथ लिख पाने वाली तुम्हारी कलम यह लिखने को विवश हो जाएगी- ”और तो क्या था बेचने के लिए अपनी आँखों के ख़्वाब बेचे हैं.” सन्नाटे को और मुखर करती कलम मौन हो गई थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “कलम

  1. कलम की व्यथा यों ही मुखर नहीं हो रही थी. आज जब लॉकडाउन में ढील देकर अनलॉक कर दिया गया है, तब कोरोना के मामलों में निरंतर वृद्धि होती दिखाई दे रही है. अब फिर लॉकडाउन का खतरा मंडरा रहा है. इसी बीच अवसाद और आत्महत्या के किस्से बढ़ गए. घरेलू कलह में वृद्धि की भी खबरें आ रही है, क्योंकि सन्नाटे ने मानव को अंदर से खोखला कर दिया.

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