हास्य व्यंग्य

ईवीएम की आत्मकथा

मैं ईवीएम अर्थात इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन हूँ I मेरा भरापूरा परिवार है I चुनाव आयोग मेरे पिता हैं और सभी राजनैतिक दल मेरे देवर I विजय – पराजय नामक मेरी दो पुत्रियाँ हैं I भरापूरा परिवार होने के बावजूद मैं आजकल बहुत दुखी और हताश हूँ I राजनैतिक दल मुझे निरंतर बदनाम कर रहे हैं I मेरे चरित्र पर लांछन लगाया जा रहा है I मेरे चरित्र को लेकर विरोधी दल के नेता और देश के शांतिदूत सड़कों पर उतर आए हैं I कह रहे हैं कि ईवीएम के कारण लोकतंत्र खतरे में पड़ गया है, निष्पक्ष चुनाव नहीं हो रहे हैं, बटन कहीं दबाओ, वोट सत्ताधारी दल को ही जाता है I कोई नई बात नहीं है I अक्सर भारत का लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है I यह लोकतंत्र इतना नाजुक, छुईमुई और कोमलांग है कि जरा – सी तेज हवा चली नहीं कि यह खतरे में पड़ा I सत्ताधारी दल का कोई मंत्री जोर से छींक देता है तो इस नाजुक लोकतंत्र पर ग्यारह हजार वोल्ट का खतरा उत्पन्न हो जाता है, किसी मंत्री के खाँस देने मात्र से लोकतंत्र का नाड़ा ढीला हो जाता है I इस लोकतंत्र को बचाने के लिए लोग बसों में आग लगा रहे हैं, सरकारी कार्यालयों और इमारतों में तोड़फोड़ कर रहे हैं, बीमारों को अस्पताल जाने से रोक रहे हैं I लोकतंत्र प्रहरियों के एक हाथ में संविधान और दूसरे हाथ में पेट्रोल बम, बंदूक व पत्थर है I कुछ दिन पहले किसी युवक ने फेसबुक पर ईवीएम के पक्ष में अपने विचार व्यक्त किए थे I इसी बात को लेकर लोकतंत्र समर्थकों की भीड़ ने फेसबुक पोस्ट के बहाने दो पुलिस स्टेशनों को आग के हवाले कर दिया, तीन सौ से अधिक गाड़ियों में आग लगा दी, साठ से अधिक पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया I फेसबुक पोस्ट करनेवाला युवक स्थानीय विधायक का भतीजा था I इसलिए लोकतंत्र के रक्षकों ने विधायक के घर को भी जला दिया I ये लोग लोकतंत्र के जागरूक प्रहरी हैं, संविधान की रक्षा करने के लिए ही येलोग अभी तक इस धरती पर जीवित हैं अन्यथा ये कब का इस धरा धाम को छोड़ चुके होते I येलोग लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए हमेशा आकुल – व्याकुल रहते हैं I जब तक ऐसे लोग देश में जीवित हैं तब तक लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं हो सकता है I कल अर्बन नक्सली प्रोफेसर धूर्तानंद ने ईवीएम के बारे में एक लेख लिखकर भारत के लोकतंत्र पर मंडराते हुए खतरे से लोगों को सावधान किया I इस आलेख को पढकर मेरे खिलाफ लोग सड़कों पर आ गए I मुझे गंदी – गंदी गलियां देने लगे I मुसीबत की मारी मैं अपना दुःख किससे कहूँ – दुखवा का से कहूँ मोरी सजनी I दुःख के कारण मेरे नयना सावन – भादो बन गए हैं I मैं अपने भाग्य को कोस रही हूँ कि क्यों मैंने ईवीएम तन पाया I झूठा सब संसार है, कोऊ न अपना मित – अब कोई मेरे काम नहीं आ रहा, न सत्ता पक्ष, न विपक्ष I तनाव से मेरा माथा फटा जा रहा है I अब तो राम जी का ही सहारा है कि वे मेरी लाज को सरेआम नीलाम होने से बचाएंगे I यदि विपक्षी दल पराजित हो जाते हैं तो सार्वजनिक रूप से मेरी इज्जत का तमाशा बनाते हैं, मेरा चरित्र हनन करते हैं, लेकिन विजयी होने पर मेरे सम्मान में एक शब्द भी नहीं बोलते I नेतागण मुझ पर पक्षपात करने का आरोप लगाते हैं I कहते हैं कि कलमुंही, करमजली ! तुमने सर्वहारा पार्टी के साथ मुंह काला कर मुझे परास्त कर दिया है जबकि मैं गंगाजल लेकर शपथ खा सकती हूँ कि मैंने कोई पाप नहीं किया है, मैं सीता की तरह पवित्र हूँ I हर चुनाव के बाद मुझे अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है I अग्नि परीक्षा देते – देते मैं तो थक चुकी हूँ – अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल I मेरा दामन पाक साफ है, मेरा चरित्र दुग्धधवल है I मैं सीता की तरह अग्निपरीक्षा दे सकती हूँ लेकिन पातालीय राजनीति में कोई राम नहीं है जिसके सम्मुख मैं अग्निपरीक्षा दे सकूं I फिर चुनाव परिणाम आनेवाला है I मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई है I परास्त होने पर विपक्षी दल कहेंगे कि तुमने सर्वहारा पार्टी के साथ सेटिंग करके मुझे पराजित करवा दिया वर्ना मेरी पार्टी को सात सौ सीटें आनेवाली थीं I मेरे साथ ही मेरे जनक चुनाव आयोग को भी खूब गालियाँ दी जाएंगी I मैंने पूर्व जन्म में जरूर कोई पाप किया होगा कि मैं ईवीएम के रूप में पैदा हुई I हाय मेरा दुर्भाग्य ! अब तो मेरी रक्षा ईश्वर ही करेगा – लाज रखो गिरिधारी, अब तो एक भरोसा तिहारी I इस वसुधा पर मुझ जैसी अभागी कोई न होगी I मैं बिना कोई पाप किए ही लोगों की गाली सुनने के लिए अभिशप्त हूँ I जब पार्टियां विजयी होती हैं तो कोई मुझे धन्यवाद के दो मीठे बोल भी नहीं बोलता, लेकिन पराजय का ठीकरा सभी मुझ पर फोड़ते हैं I कमजोर की बीवी न हुई, सबकी भौजाई हो गई I हाय दइया ! अब मैं कहाँ जाऊं ! मेरे लिए तो मेरे जनक ने कोई तनाव मुक्ति केंद्र भी स्थापित नहीं किया है I कलियुग में कितना भी जप, तप कर लो, कोई साधु नहीं मानता I मैंने अपने जीवन की चादर को सफ़ेद रखा है, कोई दाग नहीं है, कोई पाखंड का राग नहीं, फिर भी लोग मेरे मुख पर बदनामी की कालिख लगाते ही रहते हैं I अब तो लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की तरह मेरा ईवीएम जीवन भी मेरे लिए पहाड़ हो गया है – दिन नहीं चैन, रैन नहीं निंदिया I पेट में भूख नहीं, आँखों में नींद नहीं I कैसा अभिशप्त जीवन है !! सभी लोग मुझे शंका की निगाह से देखते हैं I मेरे अपने भी अब मेरे चरित्र पर शंका करने लगे हैं I लगता है कि सचमुच कलियुग आ गया है –
यह कलियुग आयो अबै, साधु न मानै कोय I
कामी, क्रोधी मसखरा, तिनकी पूजा होय II (कबीर)

परिचय - वीरेन्द्र परमार

जन्म स्थान:- ग्राम + पोस्ट- जयमल डुमरी, जिला:- मुजफ्फरपुर(बिहार) -843107, जन्मतिथि:-10 मार्च 1962, शिक्षा:- एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें :-1.अरुणाचल का लोकजीवन(2003) 2. अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य(2009) 3.हिंदी सेवी संस्था कोश(2009) 4.राजभाषा विमर्श(2009) 5. कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय (2010) 6. हिंदी:राजभाषा,जनभाषा,विश्वभाषा (संपादन- 2013) 7.पूर्वोत्तर भारत: अतुल्य भारत (2018) 8.उत्तर - पूर्वी भारत के आदिवासी (2020) मोबाइल- 9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com

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