लघुकथा

अवज्ञा

”मैं सारा दिन आपकी सेवा में मुस्तैद रहती हूं, अगर कभी आपकी आज्ञा नहीं मान पाती, तो इसे अपनी अवज्ञा मत समझिए, मेरी तकनीकी गड़बड़ी को ठीक करवाइए. मुझे अपने इशारों पर चलने वाली कठपुतली मत समझिए.” लिफ़्ट ने कहा.

”मैं अनवरत अपने ताप और प्रकाश का पुञ्ज लेकर आपकी हाजिरी बजाता हूं. अपना सर्वस्व लुटाकर भी अवज्ञा के लिए कोसा जाता हूं. आपने जो प्रदूषण का जाल फैलाया है, उसको समेटिए.” सूर्य ने कहा.

”मैं तुम्हारा मनोरंजन करती हूं, अगर कभी नाच नहीं पाती, तो मेरी डोर को ठीक से पकड़िए. मुझे नचाइए, मगर प्यार से.” कठपुतली ने कहा.

”मैं सारा दिन घर में खटती रहती हूं, मेरी मजबूरी-मुसीबत को कोई नहीं समझता. सब मुझे कठपुतली समझते हैं.” एक समय तुमने कहा था.

”अब अपनी बहू की मजबूरी-मुसीबत को भी तो समझो! उसको भी तो वही सब कुछ करना है, घर-गृहस्थी के साथ बच्चों की परवरिश करना, नौकरी-कारोबार की देखभाल करना, नौकर-चाकरों को संभालना, उसकी हर बात अवज्ञा तो नहीं ही है न! आखिर उसकी भी तो कुछ इच्छाएं-आकांक्षाएं होंगी!” तुम्हारे मन ने कहा.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

One thought on “अवज्ञा

  1. सबकी अपनी-अपनी सीमाएं-विवशताएं होती हैं, उन्हें खुद ही समझना चाहिए. केवल अपनी विचारधारा थोपने से सामने वाले के मन में विद्रोह की भावना घर कर जाती है और मौन टूटकर सारी मर्यादाओं का उल्लंघन कर जाता है. अपने साथ बीते हुए समय को याद कर व्यवहार करने से परिवार में स्नेह-प्रेम बना रहता है.

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