कविता

चाय की इक प्याली

चाय सदा बहार पेय है
बच्चे बूढ़े और जवान
सब को चस्का चाय का
काली,निबू वाली फिर हो
चाय दूध वाली
और मसाले वाली की तो
बात अलग है
ऐसा समझो
जैसे चस्का दूजी का
जाड़े में जो
सुबह सुबह बिस्तर में ही
मिल जाए चाय
अदरक मसाले वाली
मत पूछो
मद मस्त हो जाए
सुबह हमारी
यारों कुछ मिले न मिले
पर मिल जाए
गरम गरम
प्याली इक चाय की
*

परिचय - ब्रजेश गुप्ता

मैं भारतीय स्टेट बैंक ,आगरा के प्रशासनिक कार्यालय से प्रबंधक के रूप में 2015 में रिटायर्ड हुआ हूं वर्तमान में पुष्पांजलि गार्डेनिया, सिकंदरा में रिटायर्ड जीवन व्यतीत कर रहा है कुछ माह से मैं अपने विचारों का संकलन कर रहा हूं M- 9917474020

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