कविता

बेटी हम शर्मिंदा हैं

बेटी हम शर्मिंदा हैं,
कातिल तेरा जिन्दा है।
किया कृत्य तेरे साथ है,
दुःख कितना तुमने देखा है।।
                 बेटी हम शर्मिंदा हैं……….
नहीं शर्म आती दरिंदो को,
ना देखें उम्र ना देखें मासूमियत।
इन को तो अपने मतलब से मतलब,
क्या इनके घर में नहीं है बेटी।।
               बेटी हम शर्मिंदा हैं……….
जिस बच्ची पर ज़ुल्म हुआ,
वो बेटी कितनी रोई होगी।
मेरा कलेजा फट जाता हैं,
तो उसकी मां कैसे सोई होगी।।
                बेटी हम शर्मिंदा हैं……….
चाह कर भी तुम ना जी पाई,
इस पापी संसार में।
दुःखी है  तुम्हारे माता- पिता,
इन दरिंदो के काम से।।
                बेटी हम शर्मिंदा हैं……….
कर ना सके हम तुम्हारे लिए कुछ,
हम बड़े मजबूर हैं।
क्यों कि बेटी हम तुम से बहुत दूर है,
इन हैवानों के कारण पूरा देश बदनाम है।।
               बेटी हम शर्मिंदा हैं……….
इनको इतनी सजा मिले कि,
इनकी भी पीढ़ी दर पीढ़ी याद रखें।
इन दुष्टों को सजा मौत की मिले,
रहे ना सके ये किसी काम के।।
                बेटी हम शर्मिंदा हैं……….
— अवधेश कुमार निषाद मझवार

अवधेश कुमार निषाद मझवार

ग्राम पूठपुरा पोस्ट उझावली फतेहाबाद आगरा(उत्तर प्रदेश) M-.8057338804