बाल कविता

मोर

मोर हूं मैं मोर हूं,
बच्चों का प्यारा मोर हूं,
सुंदर अनगिन रंगों वाला,
करता सबको विभोर हूं.
तनिक नहीं हूं मैं इतराता,
चाहे पक्षीराज कहाता,
सिर पर मेरे कलंगी है
नाचना मेरे मन को भाता.
खुले वनों में रहता हूं,
राष्ट्रीय पक्षी भारत का हूं,
इंग्लिश में पीकॉक’ कहाता,
संस्कृत में मैं मयूर हूं.
राजाओं का प्यार मिला है,
कई कथाओं का किरदार,
मोरमुकुट निज शीश-सजैया
मनमोहन का हूं मैं प्यार.
कीड़े-मकोड़े खाकर मैं हूं,
फसलों की रक्षा करता,
धरती पर मैं चलूं मटकता,
पंख पसार कभी मैं उड़ता.
अक्सर नीले रंग का हूं मैं,
कभी सफेद-हरा-गुलनार,
बादल देख के नाच दिखाता,
बच्चों से मैं करता प्यार.

बाल गीत पर कुछ विशेष टिप्पणियां-

आदरणीय टीचर जी, बाल कविता बहुत अच्छी लिखी आपने. आप तो सर्वगुण संपन्न हैं टीचर जी.

सुंदर लाजवाब सृजन बहन जी बधाई

आजकल स्कूल की छुट्टियां चल रही है……पोते को होम वर्क में एक बाल गीत लिखना था……वाह छोटा…और सुन्दर गीत मिल गया है…..नहीं तो कहां सुभद्रा कुमारी चौहान की बड़ी कविता नेट से लिखनी पड़ती…….

लीला जी अति सुंदर बच्चों के लिए हिंदी में नर्सरी रैम

परिचय - *लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

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