भाषा-साहित्य

भारत के जन-मन की आत्मा है हिंदी*

विश्व हिंदी सम्मेलन के द्वारा विश्व स्तर पर हिंदी का प्रचार प्रसार हेतु भारत में सर्वप्रथम नागपुर में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के तत्वावधान में 10 जनवरी 1975 से 14 जनवरी 1975 तक आयोजित हुआ। इस सम्मेलन का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के द्वारा हुआ था। इस सम्मेलन में 30 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इस प्रथम हिंदी सम्मेलन की थीम -“वसुधैव कुटुंबकम” थी। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को आधिकारिक रूप का दर्जा हेतु प्रथम प्रयास किया गया था।  भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 से विश्व हिंदी दिवस के रूप में मैंने जाने की घोषणा की गई। ताकि वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार किया जाए। हिंदी का महत्व,उपयोगिता विश्व स्तर पर बढ़ सके। हिंदी की प्रगति हो सके।
भाषा मानव विकास के लिए प्राण वायु के समान है। जिसके अभाव में मनुष्य अंधेरी गुफा में फसा हुआ हो ठीक वैसे। शब्द एवं भाषा रूपी ज्योति के प्रकाश से ही मानव पशु से अलग है।विकसित है। भाषा के बिना हमारी सभ्यता ,संस्कृति, परंपरा,कला, रीति-रिवाज का; देश का मूलभूत ढांचा ही नहीं बन सकता है। हिंदी हमारी मातृभाषा है ना की मात्र  भाषा है।हमें हमारी मातृभाषा हिंदी पर गर्व करना चाहिए। वह दुनिया में अपनी जगह बना चुकी है। हिंदी हमारे भारत देश की जन -मन की आत्मा है।आज हिंदी विश्व पटल पर रम गई है। छा गई है। हिंदी डिजिटल की भाषा के सारे गुणों के साथ अपनाई जा रही है।हिंदी को गर्व के साथ एवं स्वाभिमान के साथ आत्मसात करने की आवश्यकता है।जिस इंसान का अपने ही घर में सम्मान नहीं दिया जाएगा भला उसका पड़ोसी सम्मान कैसे करेगा? हिंदी को विदेशी राष्ट्राध्यक्ष भी बोलने का प्रयास करते हैं तो फिर हमारे ही चंद लोग महत्त्व क्यों नहीं दे पाते हैं? हिंदी आज जन भाषा है। नेता वोट भी इसी भाषा में मांगते हैं किंतु कुछ नेता जीतने के बाद हिंदी को भूल जाते हैं। यह अलग बात है। जिस प्रकार सामान्य व्यक्ति देसी शराब पीकर टूटी-फूटी अंग्रेजी शुरू कर देता है।हिंदी सहज भी है,सरल भी है और लचीली भी है। हिंदी भाषा में ऐसा सामर्थ्य भी है जिसमें अनेक प्रचलित शब्दों को अपने में समेटने की उदारता का तो विश्व के बाजार में अपनी अहमियत रखने का विशेष गुण भी।भारत के लिए एकमात्र हिंदी भाषा ही है जो राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांध सकती है। जिससे राष्ट्र का विकास सहज रूप से तीव्र गति से हो सकता है। यह बात आजादी सेे पहले महान् साहित्यकार बाबू भारतेंदु हरिश्चंद्र ने और बाद मेंं राजनीतिज्ञ एवं स्वतंत्रता सेनानी महात्मा गांधी ने अच्छी तरह से समझी थी। राष्ट्रभाषाा से ही राष्ट्र का उद्धार संभव है।
        भाषा ही इंसान के दिलों को जोड़ने का काम करती है। भाषा का बदलाव वातावरण ,स्थान, जलवायु ,समाज,संस्कृति, प्रकृति के अनुसार तो है ही मनुष्य की आत्मा से भी जुड़ा हुआ है।भाषा मनुष्य की आत्मा की संजीवनी है। मनुष्य की अवस्था बचपन,किशोरावस्था जवानी, बुढ़ापा होती है। वैसे भाषा भी अपना रूप लेती सीमटती- मिटती रहती है जो समय के दौर में नदी की तरह बहती बदलती है। किसी राष्ट्र के लिए उसकी राष्ट्र भाषा और लिपि महत्वपूर्ण होती है। वही पहचान है। वही एकता का सूत्र है। वही विकास की कड़ी है। वही संस्कृति की पहचान है। वही खुशबू है। वही मिसाल। जो सुख और शांति अपनी भाषा में मिलती है वह दूसरी भाषा में नहीं मिलती है। अपनी भाषा में आत्मिक सुख, आत्मसम्मान, अपनत्व, मैत्री, संवाद, समझ, ध्यान और उन्नति होती है वह दूसरी भाषा से नहीं ।क्योंकि निज भाषा में हजारों वर्षों की संचित विरासत बसी होती है जिसमें लोक साहित्य संस्कृति परंपरा या ज्ञान-विज्ञान, कला, अध्यात्म, इतिहास की सभ्यता मौजूद रहती है। वही हमारे मूल विकास की जड़े होती है। इन जड़ों को काटने से सब बेकार है।
यह मानसिकता आज भी बनी हुई है की अंग्रेजी नहीं तो कैरियर नहीं ।इस प्रकार अंग्रेजी मीडियम की शिक्षा ने बाबू की फौज खड़ी कर दी। वहीं बाबू की औलादे अंग्रेजी के परम भक्त बने हुए हैं।उनमें गिने-चुने अधिकारी बनकर अंग्रेजी की वकालत करने में धुआंधार लगे हुए हैं।अंग्रेजी बाबू को तो बुढ़ापे में हिंदी  संगीत,भजन सुनने की तीव्र लालसा जरूर जाग जाती है ताकि मोक्ष मिल जाए।
   अंग्रेजी हटाओ जैसा आंदोलन डॉ. राम मनोहर लोहिया ने जरूर किया था किंतु देश में ऐसा जन आंदोलन फिर देखने को नहीं मिला। देश की जनता हिंदी को अपनाने के लिए अपनी होनहार संतान को अंग्रेजी विद्यालय के बजाय हिंदी विद्यालय में शिक्षा पाने के लिए प्रथम प्राथमिकता दें तो जरूर कुछ बदलाव चमत्कार के समान दिखने लगेगा प्रतिबंध।
इस प्रकार आज हिंदी दोहरी नीति के शिकार से ग्रस्त है क्योंकि हिंदी आज विश्व पटल पर परचम फैलाकर भी सही रूप से हिंदी हमारे घर में ही उपेक्षित है। हम प्रातःकाल गुड मॉर्निंग एवं शाम को गुड इवनिंग कथा रात को गुड नाईट बोल कर अपनी बात को खत्म करते हैं। इंग्लिश में बोलने वाला बुद्धिमान समझा जा रहा है।कुछ लोगों को गलत अंदाजा है कि अंग्रेजी के बिना तकनीकी, कानूनी एवं चिकित्सा की पढ़ाई कैसे संभव है? किंतु रूस,जर्मनी, जापान, चीनी, इजराइल जैसे देश क्या अपनी ही राष्ट्रभाषा में शिक्षा नहीं दे रहे हैं? देश में कुछ चातुर्य लोग हिंदी भाषा को साधन बना रहे हैं साध्य नहीं। अपना उल्लू सीधा होने पर अंग्रेजी में ‘डिंग डांग” करने लगते हैं। आज छोटे-मोटे कार्यालय के आदेश यदि अंग्रेजी में ना हो तो क्या कार्यशैली रुक जाएगी? शादी के कार्ड पर अंग्रेजी में निमंत्रण निवेदन ना छपा हो तो शादी रुक जाएगी? इन छोटी-छोटी बातों को समझने की जरूरत है।आज देश में काम देसी हो रहा है पर देसी लोगों के लिए योजनाएं अंग्रेजी के नाम पर बन रही है। यह बात अलग है। हिंदी में भारत की आत्मा बोलती है। हिंदी अब भारतीयों की धड़कन बन चुकी है।
भारत में 140 करोड लोगों में मात्र 4% लोग ही अंग्रेजी बोलने वाले हैं। इन लोगों को “एक राष्ट्र एक भाषा” का सपना नहीं देखना चाहिए? जबकि अब तो अंग्रेजी वाले भी कहने लगे हैं-“अंग्रेजी नहीं प्रतिभा परखिए।”
हांगकांग और सिंगापुर जैसे राष्ट्र ब्रिटिश के अधिकार में है किंतु वहां के निवासी अंग्रेजी नहीं जानते हैं और कुछ लोग जानते भी हैं, फिर भी अंग्रेजी का प्रयोग नहीं के बराबर करते हैं।
हिंदी उपन्यासकार बाबू देवकीनंदन खत्री का उपन्यास “चंद्रकांता” को पढ़ने हेतु गेर हिंदी के लोग जब हिंदी सीखने लगे तो आज अपने विकास के लिए देश की एकता के लिए चंद लोग हिंदी क्यों नहीं बोल सकते? हिंदी हमारी आजादी की पहचान रही है।आचार्य विनोबा भावे ने कहा था “मैं दुनिया की सभी भाषाओं की इज्जत करता हूं।पर मेरे देश में हिंदी की इज्जत ना हो यह मैं सह नहीं सकता।” गांधी जी ने 1918 में -“हिंदी को जनमानस की भाषा कहा था।”
आज हिंदी का विकास, विस्तार तथा प्रभाव तो विश्व में तीव्र गति से हो रहा है किंतु संयुक्त राष्ट्र संघ में एवं भारत में संवैधानिक रूप से मान्यता से वंचित है।
    अनुच्छेद 343 (दो) में केवल 15 वर्ष तक अर्थात् 1965 तक हिंदी के साथ अंग्रेजी को भी ‘राजभाषा’ का दर्जा दिया गया था। ताकि 15 वर्ष में गैर हिंदीभाषी राज्यों में प्रचार-प्रसार हो सके किंतु 1967 में संसद में भाषा संशोधन विधेयक के जरिए राजकाज में अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया गया यह हिंदी के साथ बड़ा अन्याय हुआ जिसका खामियाजा हिंदी आज तक भुगत रही है। भले ही भारत सरकार का गृह मंत्रालय प्रतिवर्ष हिंदी के प्रचार- प्रसार में बहुत ही धनराशि खर्च करे। उच्च शिक्षा में जिस गति से बदलाव लाना था वह नहीं ला सका यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा।
— डॉ.कान्ति लाल यादव,

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