सामाजिक

धर्माचरण

धैर्य क्षमा संयम चोरी न करना पवित्रता और इन्द्रिय निग्रह आदि को धर्म के दस लक्षण बताया गया है। इन लक्षणों को जीवन का अंग बना लेना ही धर्माचरण हैं कर्मों की पवित्रता ही सच्चा पूजापाठ और कर्मकाण्ड है। ऐसा सत्य आचरण ही वास्तविक धर्म है। सदाचार को धर्म मान लेने के बाद यह व्यावहारिक […]

सामाजिक

कर्मफल

कर्म करना मनुष्य का काम है जिसे त्यागने पर वह जीवित नहीं रह सकता है। जीवन का आधार ही कर्म है। प्राणियों द्वारा सांस लेने की व छोड़ने की क्रिया इन्द्रियों और शरीर के अन्य कार्य करना भी एक प्रकार की से कर्म ही है। प्राणी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता […]

सामाजिक

पात्रता

उपदेशक अनेक श्रोताओं को समान रूप से उपदेश देते हैं परन्तु उनमें से कुछ लोग ही सार्थक तत्त्व ग्रहण कर पाते हैं और इस ग्रहण करने में भी अन्तर होता है। यह बात लोगों की पात्रता पर निर्भर करती। यह पात्रता किसी पात्र या बर्तन के द्वारा द्रव को अपने अन्दर धारण करने की क्षमता के […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

एषणा

एषणा का अर्थ है-कामना, इसमें मुख्यतः विवेक का अभाव रहता है। जिस व्यक्ति के मन में सदा कामनाएं बनी रहती हैं, वह किसी भी कार्य या सिद्धान्त पर नहीं टिक सकता है। एषणाएं मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती हैं-वित्तैषणा, पुत्रैषणा और लोकैषणा। मनुष्य योनि का उद्देश्य भोग के साथ योग है। इन समस्त […]

सामाजिक

अनुकरण

अनुकरण का अर्थ है नकल करना। मनुष्य में अन्य जीवधारियों की तुलना में स्वाभाविक ज्ञान अत्यन्त कम होने के कारण वह शैशव अवस्था से ही अपने सभी नित्य कर्मों को बड़ों के अनुकरण के द्वारा ही सीखता है। जहां गाय आदि पशुओं के बछड़े पैदा होते ही कुलांचे भरने लगते हैं, वहां मनुष्य का बच्चा […]