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  • “खर-पतवार”

    “खर-पतवार”

    रोज-रोज ना होय रे मुरख, तेरा मन मुझसे मनुहार मेरे अंदर भी एक आदम, खुद झिझके ना करे गुहार | बहुत मनाया नहीं पिघलता, पत्थर सा दिल है मानों दिख जाता गर बाहर होता, चीखें धांय...

  • अन्नदाता

    अन्नदाता

    एक आदमी अपने रास्ते से गुजर रहा था | सड़क के दोनों किनारों पर आम के बहुत से बाग   फलों से लदकर जमीन को छू रहें थे |   फल के बावजूद बागों में चहल-पहल...

  • मधुशाला

    मधुशाला

    ना जाने कब क्या कर बैठे, अपने मन की है ज्वाला यारों देखों शान्त न होती, पी पी कर इसकी हाला हवस हंसीली नारी नठीली, पिए अमृत भरि-भरि प्याला चितवन चटकाय कलंकन बिच, नाचे नचवाये मधुशाला...

  • माँ तेरा दर्शन

    माँ तेरा दर्शन

    खुली आँख से जग को देखा, जब बंद हुई तो आई माँ | सूरज  की पहली किरणों में, देखी  तेरी परछाई माँ || रिश्ते-नाते सब बदल रहे, अब घर भी बदला लगता है | हर मूरत बदली बिन...

  • “धरती पुत्र”

    “धरती पुत्र”

    हल नित कहें किसान से, हलधर मेरे मित्र धरती को मै चिरता, अरु धरा बिखेरे इत्र || कलम कहें कविराय से, मुझे लगाओ हाथ ज्ञानपिपासु शब्द तुम, रहों श्रृष्टि के साथ || हल और कलम समान...

  • बेजुबान घुटन

    बेजुबान घुटन

    आदमी में हलकी सी मुस्कान देखीं मैंने परायों संग उभरी हुयी पहचान देखीं मैंने | अपनों से तनिक कटके महफ़िल क्या बैठी खूब गैरों की मीठी जुबान देखी मैंने || मन, मन की चाहत जाने है...

  • एक मुट्ठी बीडी

    एक मुट्ठी बीडी

    मानू और छानू दोनों बचपन के मित्र हैं | लेकिन दोनों की सोंच और विचारधाराओं में जमीन-आसमान का अंतर है | मानू हर बात को गंभीरता से सकारात्मक रूप में लेता है तो छानू नकारात्मक व...

  • अहिवाती धरती

    अहिवाती धरती

    मै अहिवाती धरती हूँ, मुझे बेवा तो न बनाइये मेरा सुहाग है हरियाली, सूनी मांग तो न बनाइये मै ही माँ की ममता हूँ, हर जीव-जंतु की जननी हूँ श्रृंगार न मेरा रंजित हो, मुझे बंजर...