धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

ओ३म् “पापों में वृद्धि का कारण ईश्वर द्वारा जीवों को प्राप्त स्वतन्त्रता का दुरुपयोग” संसार में मनुष्य पाप व पुण्य दोनों करते हैं। पुण्य कर्म सच्चे धार्मिक ज्ञानी व विवेकवान लोग अधिक करते हैं तथा पाप कर्म छद्म धार्मिक, अज्ञानी, व्यस्नी, स्वार्थी, मूर्ख व ईश्वर के सत्यस्वरूप से अनभिज्ञ लोग अधिक करते हैं। इसका एक […]

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जन्म-मृत्यु का चक्र आत्मा की मुक्ति व अनन्तकाल तक चलेगा

ओ३म् विज्ञान एवं दर्शन का नियम है कि अभाव से भाव पदार्थ उत्पन्न नहीं होता और भाव पदार्थों का अभाव नहीं होता। इसी आधार पर ईश्वर, जीवात्मा और इस सृष्टि का उपादान कारण त्रिगुणात्मक प्रकृति भाव पदार्थ सिद्ध होते हैं जो सदा से हैं तथा जिनका अभाव कभी नहीं होगा। यदि इस जगत् में प्रकृति […]

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पाप कर्मों का त्याग तथा वेद धर्माचरण ही जन्म-जन्मान्तरों में सुख व उन्नति का आधार है

ओ३म् मनुष्य को यह जन्म उसके पूर्वजन्मों के पाप–पुण्यरूपी कर्मों के आधार पर मिला है। वह इस जन्म में जो पाप व पुण्य कर्म करेगा, उससे उसका भावी जन्म निर्धारित होगा। जिस प्रकार फल पकने के बाद वृक्ष से अलग होता है, इसी प्रकार हम भी ज्ञान प्राप्ति और शुभ कर्मों को करके ही जन्म […]

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ईश्वर निराकार एवं सर्वव्यापक है

ओ३म् हम अपने शरीर व संसार को देखते हैं तो विवेक बुद्धि से यह निश्चय होता है कि यह अपौरुषेय रचनायें हैं जिन्हें ईश्वर नाम की एक सत्ता ने बनाया है। वह ईश्वर आकारवान या साकार तथा एकदेशी वा स्थान विशेष में रहने वाला कदापि नहीं हो सकता। ईश्वर सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान सिद्ध होता है। […]

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हमें अपनी आत्मा व इसके स्वरूप को जानने का प्रयत्न करना चाहिये

ओ३म् हम मनुष्य हैं। हमारे पास मनन, चिन्तन, विचार, ध्यान व सत्यासत्य का निर्णय करने के बुद्धि है। इन साधनों से हम स्वयं अर्थात् अपनी आत्मा को भी जान सकते हैं। हम एक चेतन सत्ता है। हमारा निवास हमारे शरीर के भीतर है। हमारा शरीर हम नहीं है। शरीर तो पांच भूतों पृथिवी, अग्नि, वायु, […]

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ईश्वर की उपासना मनुष्य का प्रमुख आवश्यक कर्तव्य क्यों हैं?

ओ३म् मनुष्य के अनेक कर्तव्य होते हैं। जो मनुष्य अपने सभी आवश्यक कर्तव्यों का पालन करता है वह समाज में प्रतिष्ठित एवं प्रशंसित होता है। जो नहीं करता वह निन्दा का पात्र बनता है। मनुष्य का प्रथम कर्तव्य स्वयं को तथा परमात्मा को जानना होता है। हम स्वयं को व परमात्मा को कैसे जान सकते […]

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मुक्ति में आत्मा को जन्म-मरण से अवकाश एवं अलौकिक सुखों की प्राप्ति

ओ३म् मनुष्य दुःख से घबराता है तथा सुख की प्राप्ति के लिये ही कर्मों में प्रवृत्त होता है। वह जो भी कर्म करता है उसके पीछे उसकी सुख प्राप्ति की इच्छा व भावना निहित होती है। मनुष्यों को दुःख प्राप्त न हो तथा अपनी क्षमता के अनुरूप सुख प्राप्त हो, इसके लिये उसे क्या करना […]

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सद्ज्ञानयुक्त वैदिक धर्म के प्रचार में बाधक अविद्यायुक्त बातें एवं संगठन

ओ३म् वैदिक धर्म सत्य ज्ञान ‘चार-वेदों’ पर आधारित मानव धर्म है। वैदिक धर्म का आरम्भ ईश्वर से प्राप्त चार वेदों की शिक्षाओं के जन-जन में प्रचार से हुआ था। हमारे वेदों के ज्ञानी ऋषि व आचार्य ही हमारे धर्म के प्रचारक व उसके संवाहक होते थे। सद्ज्ञान से युक्त ऋषियों व विद्वानों के होते हुए […]

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ऋषि दयानन्द का मुख्य उद्देश्य वेद तथा देशभक्ति का प्रचार था

ओ३म् ऋषि दयानन्द वेदों के अपूर्व ऋषि थे। उनके जैसे ऋषि का इतिहास में वर्णन नहीं मिलता। सृष्टि के आरम्भ से देश में ऋषि परम्परा चली जो महाभारत के कुछ समय बाद तक चलकर समाप्त हो गई थी। इस दीर्घ अवधि में देश में बड़ी संख्या में ऋषि व महर्षि उत्पन्न हुए परन्तु वर्तमान में […]

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वेदों की रक्षा व प्रचार से ही विश्व में मानवता की रक्षा सम्भव है

ओ३म् मनुष्य को दुर्गुणों व दुव्र्यसनों सहित अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, मिथ्या सामाजिक परम्पराओं सहित अन्याय व शोषण से रहित मनुष्य जीवन की रक्षा के लिये सदाचारी विद्वानों, देवत्वधारी पुरुषों सहित वेदज्ञान की भी आवश्यकता होती है। यदि समाज में सच्चे ज्ञानी व परोपकारी मनुष्य न हों तो समाज में अज्ञान की वृद्धि होकर अन्याय, शोषण […]