मुक्तक/दोहा

हिंदू धर्म प्रतीक मुख्यमंत्री

उत्तर प्रदेश के २१वें मुख्यमंत्री माननीय आदित्यनाथ योगी का हार्दिक स्वागत अभिनन्दन धन्य धरा गोरखपुरी , अनुपम सांसद योग । पाँच बार जीते यहाँ मिटा सभासद भोग । हिंदू धर्म प्रतीक का , करे सदा निर्वाह । योग हिए योगी बसे , तनमन जनपद लोग । — राजकिशोर मिश्र राज प्रतापगढ़ी

सामाजिक

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

८ मार्च को हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मानते है। यह गौरव की बात है। लेकिन यह कागजों में दबकर या [दिखावा] आडम्बर मात्र हो तो बड़ा दुख होता है। नारी परिवार का अभिन्न अंग होती है, उनके शोषण की शुरूवात भी परिवार से होती है। पुरुषवादी समाज में स्त्री शोषण में कभी- […]

कविता

कविता और कवि

कविता कविता कह रहे , कविता हुई बवाल । कविता कवि को देख कर , उठने लगे सवाल । उठने लगे सवाल , हाल जब देखा सविता । लपट झपट उर लाय , चाँद नें देखा कविता । — राजकिशोर मिश्र ‘राज’

कविता

नेता उवाच

यह हिन्दुस्तान है । यहाँ नामचीन बदनाम है । टूटी सड़क नेता की हड़क नोट की बारिस पंचवर्षीय प्रलाप है । देते हैं झांसा यह अमुक मेरा निशान है । एक बार अवसर दीजिए । पाँच साल फिर आराम कीजिए । सबको देखा बार-बार रंग बदलता एक बार । नेता उवाच सूरज चंदा को धरती […]

कुण्डली/छंद

चार कहार

चार कहार उठाय चले छवि आज पिया घर जाय रही है । चार चराचर रूप लुभाय विनोद करे मन भाय रही है । कन्त बसंत भयो सतसंग जमी गुण मोहन गाय रही है । शाम ढली उर आग लगी अवशेष विशेष बताय रही है । राजकिशोर मिश्र ‘राज’

कविता

शादी की सालगिरह

आफताब की रश्मि से जैसे सबेरा होता है । जब मिलते है दो दिल तब जीवन में सबेरा होता है । [1] मुबारक हो शादी की सालगिरह साहब । प्रेम ,ज्ञान नेह मय संसार प्यार साहब । शब्दों में कोई त्रुटि हो संज्ञान लीजिए। भावना ह्रदय की मन छ्न्द कीजिए । जगमगाती रहे चाँद सी […]

कविता

वर्ण-पिरामिड

स्वर्ण साधना देह मन अहंकारित मृग तृष्णा व्याल कनक माया जाल । ये स्वर्ण प्रवेश कलियुग चढ़ मुकुट राजा परीक्षित है भ्रमित शिक्षित । दे सखे उत्कर्ष नववर्ष मुक्त संघर्ष लुप्तअपकर्ष हो फर्श अर्श हर्ष । दे रात प्रभात नयासाल कर कमाल ह्रदयविशाल मानवीय मिशाल ।

कुण्डली/छंद

कर्म प्रधान विधान जहाँ

  ब्राह्मण भोजन साद सदा, गुण क्षत्रिय तीख निभाय रहे हैं । वैश्य विधा अनुकूल प्रयोजन उत्तम भोग लगाय रहे हैं । शूद्र नियोजित वास बचे मन दीनन प्रीति लुभाय रहे हैं । कर्म प्रधान विधान जहाँ मन ‘राज’ वही मन भाय रहे हैं । । — राजकिशोर मिश्र ‘राज’ प्रतापगढी

गीतिका/ग़ज़ल

माया हँसी लोग माहिल बने

फेंक चमचा रहे – हार हरदिल बने । मंच सजती रही नाज़ महफ़िल बने ।। मीत- बनते रहे गीत बिकता रहा। टंच करने गये प्रीति माहिल बने ।। काम उनका ख़तम ढा रहें हैं सितम। भोग काया बनी . नीति जाहिल बने ।। लोभ माया हँसे रो रही थी गली । गीत कैसे लिखूं लोग […]

कविता

हम तो चलते -फिरते कवि हैं

हम तो चलते -फिरते कवि हैं जो आया मन लिख देते है आप सभी का आशिष पा कर कुछ न कुछ सिख लेते हैं हम तो चलते -फिरते कवि हैं जो आया मन लिख देते है छ्न्द अलंकृत रस क्या जाने भावों में लिख देते है अंजाने में कवियों जैसा रसना रस भर देते हैं […]