संस्मरण

वो रामगढ़ था ये लालगढ़

यादों के जनरल स्टोर में कुछ स्मृतियां स्पैम फोल्डर में पड़े रह कर समय के साथ अपने-आप डिलीट हो जाती है, लेकिन कुछ यादें बेताल की तरह हमेशा सिर पर सवार रहती है, मानो चीख-चीख कर कह रही हो मेरा जिक्र किए बगैर तुम्हारी जिंदगी की किताब पूरी नहीं हो सकती। किस्सा 2008 के मध्य […]

कविता

बकलोली की बूंदी

बकलोली की  बूंदी राहत के  रसगुल्ले जुमलों की  जलेबी आश्वासनों के  गुलाब जामुन तृप्त हो गई जनता अब बस भी करो भले मानुष बचपन में भूखे पेट बहुत सुनी राजा – महाराजा की  कहानियाँ ठंड से ठिठुरता शरीर बातों में रजाइयां — तारकेश कुमार ओझा 

कविता

मजदूर की मंजिल

पत्थर तोड़ कर सड़क बनाता है मजदूर फिर उसी सड़क पर चलते हुए उसके पैरों पर पड़ जाते हैं छाले वोट देकर सरकार बनाता है मजदूर लेकिन वही सरकार छिन लेती है उनके निवाले कारखानों में  लोहा पिघलाता है मजदूर फिर खुद लगता है गलने – पिघलने रोटी के  लिए घर द्वार छोड़ देता है […]

कविता

सड़कें यूं  उदास तो न थी ….!!

अपनों से मिलने की ऐसी तड़प ,  विकट प्यास तो न थी शहर की  सड़कें पहले कभी यूं उदास तो न थी पीपल की छांव तो हैं अब भी मगर बरगद की  जटाएंं यूं  निराश तो न थी गलियों में  होती थी समस्याओं की  शिकायत मनहूसियत की महफिल यूं बिंदास तो न थी मुलाकातों में  […]

कविता

बदल गए

मेले वही है , बस इश्तेहारें बदल गए आसमां वही है , सितारे बदल गए मायने वही है , मगर मुहावरे बदल गए आग वही है , अंगारे बदल गए गलियां वही है , शोर – शराबे बदल गए शहर वही है , बस नजारे बदल गए — तारकेश कुमार ओझा 

हास्य व्यंग्य

कोरोना काल में  मेरा शहर खड़गपुर  भी इंटरनेशनल हो गया …!!

कोरोना के कहर ने वाकई दुनिया को गांव में बदल दिया है . रेलनगरी खड़गपुर का भी यही हाल है . बुनियादी मुद्दों की जगह केवल कोरोना और इससे होने वाली मौतों की चर्चा है . वहीं दीदी -मोदी की  जगह ट्रम्प और जिनपिंग  ने ले ली है . सौ से अधिक ट्रेनें ,  हजारों […]

कविता

गांव शहर है सन्नाटा

क्या कोलकाता , क्या खड़गपुर गया  हो या टाटा कोरोना वायरस से कांपी दुनिया गांव शहर है सन्नाटा हर चेहरे पर चस्पा दहशत दौर कुछ ऐसा आया है . कैसी होगी भविष्य की दुनिया सोच कर दिल घबराया है . घर से चलेंगे बाबुओं के दफ्तर गरीब भटकेंगे दर – ब- दर अहसास से मन […]

कविता

शहर अंजान हो गया

कोरोना के  कहर में  , अपना ही शहर अंजान हो गया सुनसान हुए चौक – चौराहे बाजार वीरान हो गया , तिनके – तिनके से जहां थी दोस्ती , पहचान ही गुमनाम हो गया , लापता हो गई यारी – दोस्ती , मुल्तवी हर काम हो गया , एक अंजाने  – अनचिन्हे डर के आगे […]

हास्य व्यंग्य

कोरोना और करूणा ….

भयावह रोग कोरोना से मैं भी बुरी तरह डरा हुआ हूं। लेकिन भला कर भी क्या सकता हूं। क्या घर से निकले बगैर मेरा काम चल सकता है।  क्या मैं बवंडर थमने तक घर पर आराम कर सकता हूं। जैसा समाज के स्रभांत लोग कर रहे हैं। जीविकोपार्जन की कश्मकश के दौरान क्या मैं  भीड़भाड़ […]

संस्मरण

बंबई  के मुंबई बनने तक बहुत कुछ बदला

बंबई के मुंबई बनने के रास्ते शायद  इतने  जटिल और घुमावदार नहीं होंगे जितनी मुश्किल मेरी दूसरी  मुंबई यात्रा रही ….महज 11 साल का था जब पिताजी की अंगुली पकड़ कर एक दिन अचानक बंबई  पहुंच गया …विशाल बंबई की गोद में पहुंच कर मैं हैरान था क्योंकि तब बंबई किंवदंती  की तरह थी ….ना […]