राजनीति

राजनीति के ‘सदा मंत्री’ और रामविलास पासवान

भारतीय राजनीति में रामविलास पासवान का उदय किसी चमत्कार की तरह हुआ। ८०-९० के दशक के दौरान स्व . विश्वनाथ प्रताप सिंह की प्रचंड लहर में हाजीपुर सीट से वे रिकॉर्ड वोटों से जीते और केंद्र में मंत्री बन गए। यानि जिस पीढ़ी के युवा एक अदद रेलवे की नौकरी में जीवन की सार्थकता ढूंढ़ते […]

संस्मरण

बर्फीली रात, अयोध्या के पास !

अदालती फैसले के  बहाने 6 दिसंबर 1992 की चर्चा छिड़ी तो दिमाग में 28 साल पहले का  वो वाकया  किसी फिल्म की तरह घूम गया । क्योंकि उन बर्फीले दिनों में  परिवार में हुए  गौना समारोह के  चलते मैं अयोध्या के  पास ही था । परिजन पहले ही गांव पहुंच चुके थे । तब  मैं […]

कविता

बरगद की छांव 

बुलाती है गलियों की  यादें मगर ,  अब अपनेपन से कोई नहीं बुलाता । इमारतें तो बुलंद हैं अब भी लेकिन , छत पर सोने को कोई बिस्तर नहीं लगाता । बेरौनक नहीं है चौक – चौराहे पर अब कहां लगता है दोस्तों का  जमावड़ा  । मिलते – मिलाते तो कई हैं मगर हाथ के […]

कविता

खबरों की भीड़ में

खबरों की  भीड़ में , राजनेताओं का  रोग है . अभिनेताओं के टवीट्स हैं . अभिनेत्रियों का फरेब है . खिलाड़ियों का  उमंग है अमीरों की अमीरी हैं  . कोरिया – चीन है तो अमेरिका और पाकिस्तान भी है . लेकिन इस भीड़ से गायब है वो आम आदमी जो  चौराहे पर  हतप्रभ खड़ा है […]

कविता

जब बुखार बन गया फीवर

एक था गबरू बन गया गब्बर देश – दुनिया में  खूब मचाया अंधेर नए जमाने में  उसी के  रीमेक की  तरह बुखार बन गया फीवर जिसके नाम से अब  दुनिया  कांपे  थर – थर नाम सुनते ही क्या राजू क्या राजा पसीने से हो रहे तर – बतर बुखार वाले को देखते  ही क्या छोटे […]

इतिहास

सत्ता के  रसगुल्ले और अमर सिंह …!

जिस तरह मुलायम सिंह यादव हैं उसी तरह पहले अमर सिंह चौधरी हुआ करते थे . राजनीति में  पदार्पण  के  बाद काफी समय तक उनका यही पूरा नाम था . धीरे – धीरे वे अमर सिंह नाम से जाने – पहचाने लगे . वाकई बड़े दिलचस्प इंसान थे . राजनीति में  पैसा और पावर के  […]

कविता

घर पे ही रहता हूं

लॉक डाउन है , इसलिए आजकल घर पे ही रहता हूं . बाल – बच्चों को निहारता हूं , लेकिन आंखें  मिलाने से कतराता हूं . डरता हूं , थर्राता हूं . लॉक डाउन है , इसलिए आजकल घर पे ही रहता हूं . बिना किए अपराध बोध से भरे हैं सब इस अंधियारी रात […]

कविता

खुली आंखों का  सपना 

सुबह वाली लोकल पकड़ी पहुंच गया कलकता डेकर्स लेन में  दोसा खाया धर्मतल्ला में खरीदा कपड़ा – लत्ता सियालदह – पार्क स्ट्रीट में  निपटाया काम दोस्तों संग मिला – मिलाया जमकर छलकाया  कुल्हड़ों वाला जाम मिनी बस से हावड़ा पहुंचा भीड़ इतनी कि बाप रे बाप लोकल ट्रेन में  जगह मिली तो खाई मूढ़ी और […]

कविता

सड़कें हैं , सवार नहीं  ….!!

बड़ी मारक है , वक्त की  मार  हिंद में मचा यूं हाहाकार सड़कें हैं , सवार नहीं हरियाली है , गुलज़ार नहीं बाजार है , खरीदार नहीं गुस्सा है , इजहार नहीं सोने वाले सो रहे खटने  वाले रो रहे खुशनसीबों पर सिस्टम मेहरबान बाकी भूखों को तो बस ज्ञान पर ज्ञान जाने कब खत्म […]

हास्य व्यंग्य

क्या गुरू ..! फिर लॉकडाउन  …??

जो  बीत गई उसकी क्या बात करें . लेकिन जो बीत रही है उसे अनदेखा भी कैसे और कब तक करें .  ऐसा डरा – सहमा  सावन जीवन में  पहली बार देखा . लोग पूछते हैं …क्या कोरोना काल में  इस बार रक्षा बंधन और गणेशोत्सव भी फीके ही रह जाएंगे . यहां तक कि […]