गीतिका/ग़ज़ल

दिल्लगी करते रहे

यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहे
ज़िन्दगी भर आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे
एक मुद्दत से हक़ीक़त में नहीं आये यहाँ
ख्वाब कि गलियों में जो आवारगी करते रहे
बड़बड़ाना अक्स अपना आईने में देखकर
इस तरह ज़ाहिर वो अपनी बेबसी करते रहे
रोकने कि कोशिशें तो खूब कि पलकों ने पर
इश्क़ में पागल थे आंसू ख़ुदकुशी करते रहे
आ गया एहसास के फिर चीथड़े ओढ़े हुए
दर्द का लम्हा जिसे हम मुल्तवी करते रहे
दिल्लगी दिल कि लगी में फर्क कितना है नदीश
दिल लगाया हमने जिनसे दिल्लगी करते रहे
लोकेश नशीने “नदीश”

One thought on “दिल्लगी करते रहे

  • विजय कुमार सिंघल

    वाह वाह ! बहुत खूब !

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