गैर जिम्मेदार मीडिया
यों तो भारत का मीडिया (चैनल, अखबार सब) कभी भी देश के प्रति जिम्मेदार नहीं रहा, लेकिन आजकल तो उसने गैर जिम्मेदारी की सारी हदें पार कर डाली हैं.
ईराक से अगवा की गई नर्सों सहित हजारों भारतीयों को बिना कोई सौदेबाजी और खून खराबा किये निकाल लेने से मोदी जी की सरकार को जो प्रशंसा मिल रही है, वह इस धूर्त मीडिया को नहीं पच रही है. पहले तो इन्होने यह पूरी कोशिश की कि इस समाचार को मामूली खबर की तरह दिखाया जाये और इस विलक्षण कार्य कि तारीफ़ न होने दी जाए.
लेकिन जब वे इसमें सफल नहीं हुए, तो उन नर्सों से कहलवाया गया कि इस्लामी जेहादी आतंकियों ने उनको बहिन की तरह रखा था. वाह ! वाह !! कोई भाई अपनी ही बहनों का अपहरण कर ले जाए, यह कहाँ का भाईचारा है? किसी पत्थरकार की दुम ने उन लड़कियों से यह नहीं पूछा कि फिर वापस आयी ही क्यों? वहीँ अपने भाइयों के साथ रहतीं.
इससे भी अधिक आपत्तिजनक बात यह है कि वे उन मूर्ख लड़कियों की बात को समाचारों में बार-बार दिखाकर यह साबित करना चाहते हैं कि निर्दोषों की जघन्य हत्याएं करने वाले वे आतंकी बहुत मानवीय हैं. इससे उनका क्या उद्देश्य पूरा होता है?
कल्पना कीजिये कि अगर उनमें से एक भी अगवा लड़की या आदमी आतंकवादियों के हाथों मारा जाता, तो यही मीडिया कैसी-कैसी हायतोबा मचाता? तब तो यही मीडिया लट्ठ लेकर मोदी जी के पीछे पड़ जाता और दबाब डालकर शायद दस-बीस आतंकियों को रिहा करवा देता.
मीडिया की धूर्तता और दोमुंहेपन का यह पहला या अकेला मामला नहीं है. ऐसे अनेक मामले रोज नज़र आते हैं. एक बार मोदी जी ने एक मुल्ले से टोपी लेने से इनकार कर दिया था, तो मीडिया ने कितनी छातियाँ पीटी थीं. लेकिन अब उमर अब्दुल्ला ने कटड़ा में तिलक लगवाने और ‘जय माता दी’ कहने तक से इनकार कर दिया, तो यही मीडिया उनकी तारीफ़ किये जा रहा है, जैसे अपने धर्म का पालन करना बस मुसलमानों का अधिकार है और हिन्दुओं का कोई धर्म नहीं होता.
अब समय आ गया है कि मीडिया अपनी जिम्मेदारी समझे और दोमुंहापन छोड़कर देश के हित में कार्य करे.

बिलकुल सच्ची बात है , यह मिडिया वाले अपनी रेटिंग का ही खियाल रखते हैं और खबरों को मसाला लगा कर पेश करते हैं . मोदी जी एक इमानदार और १८ घंटे काम करने वाले विअकती हैं . नर्सों का भारत वापिस आना छोटी बात नहीं है और एक बड़ी उप्लाभ्दी है . भारती मिडिया आज़ाद है लेकिन ऐसी आजादी भी किस काम जो ख़बरों को गलत रंग दे.