उपन्यास : शान्तिदूत (तेईसवीं कड़ी)
कृष्ण को अच्छी तरह याद था कि उसी दिन राजसभा में कौरवों के सन्देशवाहक के आने पर क्या-क्या बातें हुई थीं।
पुरोहित धौम्य के हस्तिनापुर से लौटने के अगले ही दिन कौरवों का दूत उपप्लव्य नगर में आ पहुँचा था। कौरवों ने महाराज धृतराष्ट्र के सारथी संजय को अपना दूत बनाकर भेजा था। दूत का आवश्यक सत्कार करके उसे पांडवों की राजसभा में बुलाया गया और उससे कहा गया कि तुम हस्तिनापुर से जो संदेश लाये हो, वह सुना दो।
कौरवों का सन्देश सुनाने से पहले दूत संजय संकोच और लज्जा से गढ़ा जा रहा था। उसने हाथ जोड़कर क्षमायाचना करते हुए कहा था- ‘मैं जो सन्देश आपको सुनाने वाला हूँ, उसमें मेरा कोई शब्द नहीं है। यह सारा संदेश युवराज दुर्योधन ने सुनाने के लिए कहा है। इसलिए यदि आपको इस सन्देश से कोई मानसिक कष्ट होता है, तो उसके लिए मैं दोषी नहीं हूँ। कृपया मुझे क्षमा करें।’
युधिष्ठिर ने उसको आश्वस्त करते हुए कहा- ‘दूत, तुम किंचित भी चिन्ता न करो। हमें पता है कि तुम केवल संदेशवाहक हो। इसलिए संदेश जैसा भी हो सुना दो। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं होगा।’
यह स्पष्ट आदेश और आश्वासन पाकर संजय ने कौरवों का सन्देश सुनाना प्रारम्भ किया। सन्देश क्या था, केवल भर्त्सना थी। उसमें क्रमशः युधिष्ठिर, भीम, और अर्जुन को अनेक कहने-न कहने योग्य शब्दों से पुकारा गया था और उनको डराया-धमकाया गया था कि राज्य पाने की आशा छोड़कर अपने प्राण लेकर वापस वन में चले जायें। संजय ने एक यंत्रचालित कठपुतली की तरह सारा सन्देश सुना डाला और फिर क्षमायाचना करके लगा।
उससे सन्देश को सुनते हुए भीम, अर्जुन आदि सभी योद्धा क्रोध से उबल रहे थे। संजय ने कौरवों अथवा दुर्योधन की ओर से महाराज युधिष्ठिर के प्रति जैसे अपशब्द कहे थे, यदि वैसे शब्द किसी अन्य व्यक्ति ने कहीं भी कहे होते, तो भीम ने तत्काल ही उसका वध कर दिया होता। लेकिन दूत अवध्य होता है और वैसे भी उसका कोई दोष नहीं था। वह तो केवल सन्देशवाहक था और अपने कर्तव्य का पालन कर रहा था।
वास्तव में कौरवों ने जो सन्देश भेजा था, वह सन्देश नहीं बल्कि धमकी थी। उसका उद्देश्य पांडवों का मनोबल तोड़ना था, ताकि वे डर जायें और युद्ध करने का साहस न करें। उसमें संधि का कोई प्रस्ताव होने का कोई प्रश्न ही नहीं था। वह तो युद्ध का खुला आमंत्रण था। यदि पांडवों और कौरवों में सन्धि की कोई संभावना कभी थी भी, तो वह इस तथाकथित सन्देश के बाद पूरी तरह समाप्त हो गयी थी।
इस असभ्यतापूर्ण सन्देश का कोई उत्तर देने का प्रश्न ही नहीं था। इसलिए दूत को यह कहकर विदा कर दिया गया कि हमने कौरवों का सन्देश सुन लिया है और अब उसका उत्तर युद्धभूमि में ही दिया जाएगा।
दूत के जाने के बाद राजसभा में देर तक इसकी चर्चा हुई। लगभग सभी इस बात पर सहमत थे कि अब शान्तिपूर्वक राज्य मिलने की सभी संभावनायें समाप्त हो चुकी हैं, इसलिए हमें युद्ध की तिथि निश्चित करके युद्ध क्षेत्र की ओर प्रस्थान कर देना चाहिए।
हस्तिनापुर से कुछ दूर उत्तर में कुरुक्षेत्र को युद्ध स्थल के रूप में चुना गया था, जहां बहुत विस्तृत स्थान खाली पड़ा हुआ था। जिन राजाओं को युद्ध में सहायता के लिए सन्देश भेजे गये थे, उनमें से अधिकांश के उत्तर आ गये थे और उन्होंने अपनी-अपनी सेनाओं को युद्धक्षेत्र की ओर भेज दिया था। निकटस्थ राजाओं की सेनायें आ भी चुकी थीं और शेष मार्ग में थीं।
इधर युद्ध होने की संभावना जानकर भगवान वेदव्यास उपप्लव्य नगर में आ गये थे। युधिष्ठिर सहित सभी पांडवों ने उनका यथोचित सत्कार किया और आशीर्वाद माँगा। वेदव्यास ने अपना कर्तव्य जानकर उनको युद्ध से विरत करने का प्रयास किया। उन्होंने युद्ध में होने वाले विनाश का भयावह चित्र खींचा और इससे बचने का उपदेश दिया। परन्तु महाराज युधिष्ठिर ने उनसे स्पष्ट कह दिया कि युद्ध के लिए हम किसी भी प्रकार से दोषी नहीं हैं, हम तो केवल अपना राज्य चाहते हैं, जो दुर्योधन ने छलपूर्वक हमसे छीन लिया है और जिसको लौटाने से वह मना कर रहा है।
भगवान वेदव्यास इस बात से सहमत थे कि पांडवों ने द्यूत की सभी शर्तें पूर्ण कर दी हैं, इसलिए अब उनके राज्य को न लौटाने का कोई कारण नहीं है।
पांडवों से मिलने के बाद वेदव्यास हस्तिनापुर भी गये और वहाँ भी उन्होंने कौरवों की राज्य सभा में युद्ध से होने वाली संभावित विनाशलीला की विस्तृत चर्चा की और उनसे कहा कि इस विनाश को किसी भी तरह बचाना चाहिए। भीष्म, द्रोण आदि ने उनका समर्थन भी किया और पांडवों को इन्द्रप्रस्थ का राज्य लौटाने के लिए दुर्योधन को सहमत करने का प्रयास किया, लेकिन दुर्योधन ने भगवान वेदव्यास के सामने ही स्पष्ट रूप से इसे नकार दिया। अन्ततः वेदव्यास पूरी तरह निराश होकर लौट गये।
दोनों ओर से युद्ध की सारी तैयारियां की जा रही थीं। यह स्पष्ट हो चुका था कि अब वह भयंकर क्षण आ पहुंचा है जिससे बचने के लिए भगवान वेदव्यास सहित सभी ने सभी प्रकार के प्रयत्न किये थे।
(जारी…)
— डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
विजय भाई , वेद्विआस जी को मालूम था कि यदि युद्ध हुआ तो ब्हिंकर होगा और यह विनाशकारी होगा . इसी लिए उन्होंने एक अछे महान्रिशी के नाते अपनी पूरी कोशिश की कि युद्ध न हो लेकिन जब किसी की बुधि भरष्ट हो जाए तो सर्वनाश तो होगा ही . इसी तरह याहिया खान ने अपनी हैन्कड़ के कारण बंगला देश खो दिया . हिटलर ने तबाही से जर्मनी के बर्लिन के दो हिस्से करवा दिए . आप की कथा अच्छी है , इंतज़ार रहेगा अगले एपिसोड के लिए .
धन्यवाद, भाई साहब. अगली कड़ी परसों आ जाएगी. अभी तक यह कथा फ्लैशबैक में चल रही थी. अब लाइव में विस्तार से चलेगी.