कुण्डली/छंदमुक्तक/दोहा

भूषण छंद मुक्तक 

जंगल, पर्वत करुण रुदन, ताल सरोवर अवरोधन।

स्वार्थी मनु करता निज हित, धरती माता का दोहन।।

पक्षी घुमते इधर-उधर, कहाँ मिलेगा घर पोखर–

ठंडी हो छाया शीतल, अन्न फूल फल हो सोहन।।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८