नया जोश
झमाझम बारिश हो रही थी। काले काले बादलों ने आसमान को घेर लिया था। बिजली का चमकारा, गडगडाते बादल, बरसती बूँदें, लहराती पवन मन को सुकून दे रही थी।
राधिका अपने पति सुकांत के निधन के बाद अकेली ही खिडकी में बैठी अतीत के पन्ने पलटती रहती। कभी-कभी थोडी सी आहट से घबरा जाती। यादों में खोयी वर्तमान से भूतकाल में चली जाती।
नई नवेली दुल्हन बन आयी थी, तब
माँ जी उससे हमेशा कहती,
“बहू, इतना खाली समय मिल रहा है, कुछ नया सीखो। हूनर आडे वक्त काम आता है।”
माँ जी के कहने पर अनमनी सी वह संगणक सीखने लगी। धीरे-धीरे उसे आनंद आने लगा। आज संगणक से ही वह आगे बढी है।
घर से ही उस ने अपना सजावट के सामान का व्यापार शुरु किया। मेहनत एवं लगन से शीर्ष पर पहुंच गयी।
नारी शक्ति मंच ने उसे सम्मानित भी किया हैं।
आज माँ जी होती….कितना खुश होती।
मुझे उनके बताये पथ पर आगे बढना है।
अपने उद्यम को नई पहचान देनी होगी। नये जोश के साथ वह अपने काम को बढाने के लिए नई संकल्पनाएं ढूँढने लगी।
