सलमा और कृष्ण
लौटा लाऊंगा मैं
तुम्हे,
मेरे सर्वग्रासी प्रेम
गंगा की लहरो
को बाँध लूंगा
तुम्हारे दिए
रुमाल के कोने में
कर दूंगा उस जल से अभिषेक
प्रेम के प्रतीक
योनि और शिवलिंग का
बांध दूंगा
मंदिर के किनारे
तुम्हे मागने वाला
मन्नत का धागा
देखूंगा राह
अपनी दोनों आँखों से
गाँव आने वाले
हर रास्ते का
तोड़ दूंगा
मज़हब की रवायत
करूँगा तुम्हे प्रेम
तुम्हारा नाम जाने बिना
लोग पुकारेंगे हमें
सलमा और कृष्ण के नाम से
लौट आओ
ओ मेरे
सर्वग्रासी प्रेम।
–सुधीर मौर्य

कविता कुछ में समझ में नहीं आई ! जरा स्पष्ट करें.