जो मिला नहीं कभी
शाम कों ..
कमरे के भीतर
खिडकियों के करीब
जब तुम खड़ी हुई होती हो
तब मैं तुम्हें
दूर गगन में…..
डूबते हुए सूरज सा दिखाई देता हूँ
वक्त की एक गेंद की तरह
तुम्हारी हथेलियों से फिसल कर लुडकता हुआ सा …
तब तुम गहरी सांस लेती हो
जो मिला नहीं कभी
फिर भी खो गया …यह सोचकर
ठीक उसी समय ….
कमरे के बाहर
मै तुम्हारा ..सीढियों की तरह इंतज़ार कर रहा होता हूँ
तुम्हारी चप्पलों की तरह दरवाजे पर पडा हुआ होता हूँ
आँगन से गेट तक …
हरी दूबों की तरह बिछ हुआ होता हूँ
बाहर निकल कर फिर
तुम जिस खुले आसमान कों देखती हो
उसमे कपास की तरह धुनें हुए
सफ़ेद बादल मैं ही होता हूँ
मै ही तुम्हें …
सड़कों के किनारे
उगे हुए वृक्षों के काले सायों की कतारों की तरह
विभिन्न मुद्राओं में
तुम्हारे स्वागत में ..तुम्हें नृत्य करता हुआ सा लगता हूँ
मुझ धूप से …झुलसी हुई तुम्हारी देह के
असंतुष्ट मन कों चांदनी सा फिर रात में
मोह लिया करता हूँ …..
भीड़ की नदी से जैसे ही तुम
बूंद की तरह छिटक कर
एकांत के तट पर अकेली पहुँचती हो
रेगिस्तान की लम्बी ..चौड़ी ..गहरी …
ख़ामोशी की तरह ..मैं
तुम्हारी रूह में समा जाया करता हूँ
नि:शब्द
नि:स्वर ……….
न मै पर्यायवाची शब्द हूँ
न समानार्थी अर्थ हूँ
मैं अपरचित सा
एक सुकोमल स्पर्श हूँ
जो तुम्हारे ह्रदय की वीणा के तारों कों
झंकृत कर दिया करता हैं
मैं तुम्हारे लिये गुमशुदा तारे सा हूँ
और तुम भी इस जहाँ में मेरे लिये लापता सी हो
तुम मेरे सपनों में संकोच करती हुई आती हो
मै तुम्हारे ख्यालों में निसंकोच पहुच जाया करता हूँ
हमारे ख़्वाब आपस में वैसे ही मिलते हैं
जैसे ……
चाँद मिश्री की डली की तरह
झील में
घुलने की कोशिश करता हैं
रात भर ….
और झील की तरल देह
मीठी मीठी गुदगुदी कों महसूस करती हैं …
kishor kumar khorendra

कविता अच्छी है .
thank u gurmel ji
बहुत खूब !
dhnyvaad vijay ji