गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : अधूरापन

ग़मों की आग में ये दिल, मेरा जलने लगा है।
अधूरापन तुम्हारे बिन, बहुत खलने लगा है।

वो जिसको गोटियां रखने का, हुनर बख़्शा था,
वही अब चाल मेरे साथ में, चलने लगा है।

सहारे मुफ़लिसों के जिसने पायी थी हुकूमत,
गरीबों के हक़ों को, आज वो छलने लगा है।

अहम इंसान का शीशे की, माफ़िक टूट जाये,
जो आई रात तो, सूरज भी ये ढ़लने लगा है।

यहाँ सच्चाई से जिस रोज पाला पड़ गया तो,
वो झूठा बादशाह भी, आँख को मलने लगा है।

बिना तुमसे मिले, पाये, मुझे हो चैन कैसे,
तुम्हारा ख्वाब जबसे आँख में, पलने लगा है।

सुनो तुम “देव” बनकर मोम, वो जलने लगे तो,
मेरा किरदार भी फिर, बर्फ सा गलने लगा है। ”

……………चेतन रामकिशन “देव”

5 thoughts on “ग़ज़ल : अधूरापन

  • मीनाक्षी सुकुमारन

    बिना तुमसे मिले, पाये, मुझे हो चैन कैसे,
    तुम्हारा ख्वाब जबसे आँख में, पलने लगा है।

    सुनो तुम “देव” बनकर मोम, वो जलने लगे तो,
    मेरा किरदार भी फिर, बर्फ सा गलने लगा है। ”

    ……………………बेहद बेहद खूबसूरत

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी , हार्मोनिअम और तबले से इस का रंग और भी निखर कर आएगा.

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत शानदार ग़ज़ल !

  • जय प्रकाश भाटिया

    बनकर मोम, वो जलने लगे तो,
    मेरा किरदार भी फिर, बर्फ सा गलने लगा है। ”wah wah

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