कविता

वक्त का पहिया

इक समय ऐसा भी था
जब हम दूर थे एक दूसरे से
एक दूसरे को रंग न लगा पाने पर मजबूर थे
फिर वक्त का पहिया चला
और इक समय ऐसा भी आया
जब हम दोनो खूब रंगो से खेले जीवन में
एक दूसरे के तन मन को भिगो दिया रंगो से
फिर वक्त का पहिया चला
हम फिर से दूर हो गये
रंग न लगा पाने को मजबूर हो गये
फासले इतने हो गये कि
रंग सभी बेरंग हो गये
वक्त सभी का बदलता है
ये सोचने को मजबूर हो गये
न जाने अब कब
वक्त का पहिया फिर से चलेगा
और हमें रंगो से भरेगा
आज तो रंग भी उदास हैं
तुझसे मिलने की बस आस है
न जाने कब आस टूट जाये
न जाने कब ये सांस टूट जाये
ये रंगो भरी होली यूं ही बेरंगीन रह जाये
जल्दी आ कर वक्त को दिखा दो
मुझे रंगो से सजा कर वक्त को हरा दो ….

…..रमा शर्मा 

रमा शर्मा

लेखिका, अध्यापिका, कुकिंग टीचर, तीन कविता संग्रह और एक सांझा लघू कथा संग्रह आ चुके है तीन कविता संग्रहो की संपादिका तीन पत्रिकाओ की प्रवासी संपादिका कविता, लेख , कहानी छपते रहते हैं सह संपादक 'जय विजय'

One thought on “वक्त का पहिया

  • विजय कुमार सिंघल

    वाह वाह !

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