गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हमारे दिल  में वो कब  आ बसे, पता न चला,

हम उनके प्यार में कब खो चले, पता न चला ।

हाँ, उनको देख के  उठती थी इक  लहर दिल में,

हम उनकी वस्ल के तालिब भी थे, पता न चला ।

कुछ इस तरह से  रहे ग़म में  मुब्तिला  उनके,

कब अपनी आँखों से आँसू गिरे, पता न चला ।

हम  इंतजार  में  उनके   बिता  चले  इक उम्र,

वो, जैसे  चाँद, कब  आये गये, पता न चला ।

शहर में आते हैं अक्सर वो, कह रहा था रक़ीब,

किसे ख़बर  थी  बराबर, किसे  पता  न  चला ।

ऐ ‘होश’  अपनी  सुनाओ  कहाँ  रहे  अब  तक,

कि,  कैसे  हाल थे, अच्छे – बुरे ! पता  न चला ।

मनोज पाण्डेय 'होश'

फैजाबाद में जन्मे । पढ़ाई आदि के लिये कानपुर तक दौड़ लगायी। एक 'ऐं वैं' की डिग्री अर्थ शास्त्र में और एक बचकानी डिग्री विधि में बमुश्किल हासिल की। पहले रक्षा मंत्रालय और फिर पंजाब नैशनल बैंक में अपने उच्चाधिकारियों को दुःखी करने के बाद 'साठा तो पाठा' की कहावत चरितार्थ करते हुए जब जरा चाकरी का सलीका आया तो निकाल बाहर कर दिये गये, अर्थात सेवा से बइज़्ज़त बरी कर दिये गये। अभिव्यक्ति के नित नये प्रयोग करना अपना शौक है जिसके चलते 'अंट-शंट' लेखन में महारत प्राप्त कर सका हूँ।

4 thoughts on “ग़ज़ल

  • वाह पाण्डेय साहब बहुत खुब कहा है आपने। शानदार गज़ल है।

    हाँ, उनको देख के उठती थी इक लहर दिल में,

    हम उनकी वस्ल के तालिब भी थे, पता न चला ।
    ये पक्तियाँ शानदार हैं। आपको बधाई

    • मनोज पाण्डेय

      आपको अच्छी लगी, हमारा प्रयास फल हुआ। धन्यवाद ।

  • विजय कुमार सिंघल

    वाह वाह ! बहुत खूब !!

    • मनोज पाण्डेय

      आप को तो मै पहले ही बड़ा वाला दे चुका हूँ , धन्यवाद ।

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