उपन्यास अंश

उपन्यास : देवल देवी (कड़ी 59)

54. अध्यादेश एवं धर्म स्थापना

सिंहासन रोहण के उपरांत साम्राज्ञी देवलदेवी और सम्राट धर्मदेव ने धर्म के अनुसार शासन-व्यवस्था को सुदृढ़ किया। वह हिंदू जो बलात कैद किए गए थे उन्हें स्वतंत्र कर दिया गया। राजमहल में विभिन्न देवी-देवताओं की स्थापना की गई। पूरे नगर, राजधानी और संपूर्ण देश में सभी को अपने धर्मानुसार रहने की छूट दी गई। हर ओर हर्षोल्लास का वातावरण निर्मित हो गया। वह हिंदू जो एक शताब्दी से भी अधिक समय से कुचले जा रहे थे अब उनका उत्कर्ष होने लगा।

अब तक केवल हिंदू कन्याओं और मुस्लिम युवकों का ही विवाह होता था। सम्राट की आज्ञानुसार अब हिंदू युवक भी मुस्लिम युवतियों के साथ विवाह कर सकते थे। खिलजी वंश की तमाम शहजादियों ने हिंदू युवकों से हिंदू धर्म के अनुसार विवाह किए। इस प्रकार सम्राट धर्मदेव और देवलदेवी के शासन में हर धर्म के लोग सुखी और संपन्न हो गए।

सुधीर मौर्य

नाम - सुधीर मौर्य जन्म - ०१/११/१९७९, कानपुर माता - श्रीमती शकुंतला मौर्य पिता - स्व. श्री राम सेवक मौर्य पत्नी - श्रीमती शीलू मौर्य शिक्षा ------अभियांत्रिकी में डिप्लोमा, इतिहास और दर्शन में स्नातक, प्रबंधन में पोस्ट डिप्लोमा. सम्प्रति------इंजिनियर, और स्वतंत्र लेखन. कृतियाँ------- 1) एक गली कानपुर की (उपन्यास) 2) अमलतास के फूल (उपन्यास) 3) संकटा प्रसाद के किस्से (व्यंग्य उपन्यास) 4) देवलदेवी (ऐतहासिक उपन्यास) 5) माई लास्ट अफ़ेयर (उपन्यास) 6) वर्जित (उपन्यास) 7) अरीबा (उपन्यास) 8) स्वीट सिकस्टीन (उपन्यास) 9) पहला शूद्र (पौराणिक उपन्यास) 10) बलि का राज आये (पौराणिक उपन्यास) 11) रावण वध के बाद (पौराणिक उपन्यास) 12) मणिकपाला महासम्मत (आदिकालीन उपन्यास) 13) हम्मीर हठ (ऐतिहासिक उपन्यास) 14) इंद्रप्रिया (ऐतिहासिक उपन्यास) 15) छिताई (ऐतिहासिक उपन्यास) 16) सिंधुसुता (ऐतिहासिक उपन्यास) 17) अधूरे पंख (कहानी संग्रह) 18) कर्ज और अन्य कहानियां (कहानी संग्रह) 19) ऐंजल जिया (कहानी संग्रह) 20) एक बेबाक लडकी (कहानी संग्रह) 21) हो न हो (काव्य संग्रह) 22) पाकिस्तान ट्रबुल्ड माईनरटीज (लेखिका - वींगस, सम्पादन - सुधीर मौर्य) पुरस्कार - कहानी 'एक बेबाक लड़की की कहानी' के लिए प्रतिलिपि २०१६ कथा उत्सव सम्मान। ईमेल ---------------sudheermaurya1979@rediffmail.com

One thought on “उपन्यास : देवल देवी (कड़ी 59)

  • विजय कुमार सिंघल

    अंत भला तो सब भला !

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