कविता

बेजुबान घुटन

आदमी में हलकी सी मुस्कान देखीं मैंने

परायों संग उभरी हुयी पहचान देखीं मैंने |

अपनों से तनिक कटके महफ़िल क्या बैठी

खूब गैरों की मीठी जुबान देखी मैंने ||

मन, मन की चाहत जाने है बेहतर

हर शय हर आँगन में एक ही खबर

चहलकदमी खूब है पुरानी गली में

सजी-संवरी नुक्कड़ पर दुकान देखी मैंने ||

मन से पुरवाईयों के करीब जाके देखा

रुसवाइयों का साया करीब पाके देखा |

नफरतों का घर रास आता भी कैसे

तन्हाइयों की घुटन बेजुबान देखी मैंने ||

सूनी सी रात और मुरझाया सा दिन

हाथों का खिलौना हुआ सपेरे का बीन |

करचली सांप की देख डर गया नौनिहाल

उसी चौपाल पर मदारी की दुकान देखी मैंने ||

आम है परिंदों के घर अण्डों की चोरी

भगत बगुला सुनाता है तालाब को लोरी |

सपना समंदर ही हर छोटी मछली का

सिकुडन किनारों पर खूब पटान देखी मैंने ||

रिश्तों के ढलान में रिश्ता कहीं और से

गम छुपाकर खूब हंसते हैं लोंग गैर से

दर्द पर मरहम, हाथ अपना हों कोई

बेजुबान आँखों में तड़प बेसुमार देखी मैंने ||

महातम मिश्र

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ

2 thoughts on “बेजुबान घुटन

  • विजय कुमार सिंघल

    बढ़िया !

    • महातम मिश्र

      सादर धन्यवाद श्री विजय कुमार सिंघल जी…….

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