सामाजिक

माटी की महक

अपना घर , गांव , तालुका , ज़िला राज्य , और देश किसको प्रिय नही है। उस मिट्टी से निकलने वाली रवि रश्मि की आभा किसको भावविभोर नही करती है , प्रातः काल का सुहाना मौसम किसको आनन्ददायी नही लगता। अपनेपन का अहसास रोम -रोम को रोमांचित कर देता है। रिमझिम – रिमझिम करती हुई जल की किरणों को देखकर ऐसा लगता है जैसे मेघों से आंख मिचौली कर रही है। तरु पल्लवों पर पड़ी हुई जल की बूँदे सीप से निकली हुई मोती की तरह अपनी आभा को बिखेर कर स्वयं से इठला रही हैं। हम भी किसी मोती से कम नही, आखिर मोती देता क्या है, हम तो किसान की चाहत हैं। उसकी अभिलाषा और उसके जीवन का आधार हूँ। उसकी बगिया का सृजनहार हूँ। पपीहे के जीवन का आधार हूँ= स्वाति नक्षत्र की वह बूंद हूँ ,,,मोतियों का नूर हूं , फिर भी कितना गतिशील हूँ। हमारी चाहत में लोग आंखे बिछाये रहते है /मेरे प्यारे कब आओगे।

माली निशिदिन करता ध्यान , कृषक मुझे माने भगवान।

जीव -जन्तु सब मुझको प्यारे , हम उनकी आंखों के तारे।

पथिक मुझे देख हरसाये , नूतन भाव हृदय मेआये।

मेरी महिमा का गुण गान ,, फिर भी ना जाने इंसान।।

राज किशोर मिश्र ‘राज’

 

राज किशोर मिश्र 'राज'

संक्षिप्त परिचय मै राजकिशोर मिश्र 'राज' प्रतापगढ़ी कवि , लेखक , साहित्यकार हूँ । लेखन मेरा शौक - शब्द -शब्द की मणिका पिरो का बनाता हूँ छंद, यति गति अलंकारित भावों से उदभित रसना का माधुर्य भाव ही मेरा परिचय है १९९६ में राजनीति शास्त्र से परास्नातक डा . राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय से राजनैतिक विचारको के विचारों गहन अध्ययन व्याकरण और छ्न्द विधाओं को समझने /जानने का दौर रहा । प्रतापगढ़ उत्तरप्रदेश मेरी शिक्षा स्थली रही ,अपने अंतर्मन भावों को सहज छ्न्द मणिका में पिरों कर साकार रूप प्रदान करते हुए कवि धर्म का निर्वहन करता हूँ । संदेशपद सामयिक परिदृश्य मेरी लेखनी के ओज एवम् प्रेरणा स्रोत हैं । वार्णिक , मात्रिक, छ्न्दमुक्त रचनाओं के साथ -साथ गद्य विधा में उपन्यास , एकांकी , कहानी सतत लिखता रहता हूँ । प्रकाशित साझा संकलन - युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच का उत्कर्ष संग्रह २०१५ , अब तो २०१६, रजनीगंधा , विहग प्रीति के , आदि यत्र तत्र पत्र पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं सम्मान --- युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच से साहित्य गौरव सम्मान , सशक्त लेखनी सम्मान , साहित्य सरोज सारस्वत सम्मान आदि

4 thoughts on “माटी की महक

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    बहुत खूब .

    • राज किशोर मिश्र 'राज'

      आदरणीय सादर नमन धन्यवाद एवम् आभार

  • विजय कुमार सिंघल

    अच्छा लिखा है !

    • राज किशोर मिश्र 'राज'

      आदरणीय सादर नमन धन्यवाद एवम् आभार

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