कविता

कविता

समाज से बड़कर बस अपना थोड़ा सा स्वार्थ हो गया |
चन्द पैसों और ज़मीन के लिए अपनों मे कितना विवाद हो गया |
एक दूजे को देते दोष हर बात दूसरे पे इल्ज़ाम हो गया |
देश की सोच कब करनी जब मौहल्ले मे बेतलब संग्राम हो गया |
समाज से बड़कर बस अपना थोड़ा सा स्वार्थ हो गया |
पूछती है धरती माँ ,भारत माँ क्या देश का अपने हाल हो गया |
गैरों से क्या बचाओगे मुझे जब अपनों का बुरा हाल हो गया |
हर भारतवासी बड़ाएगा जिस दिन देश की शान ,
उस दिन लगेगा कि मेरा भारत अब महान हो गया |||
कामनी गुप्ता ***

कामनी गुप्ता

माता जी का नाम - स्व.रानी गुप्ता पिता जी का नाम - श्री सुभाष चन्द्र गुप्ता जन्म स्थान - जम्मू पढ़ाई - M.sc. in mathematics अभी तक भाषा सहोदरी सोपान -2 का साँझा संग्रह से लेखन की शुरूआत की है |अभी और अच्छा कर पाऊँ इसके लिए प्रयासरत रहूंगी |

4 thoughts on “कविता

  • विजय कुमार सिंघल

    बढ़िया !

    • कामनी गुप्ता

      Thanks sirji

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    very good poem.

    • कामनी गुप्ता

      Thanks ji

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