कविता

मुस्कुराना….रस्म – भर तो नहीं

मुस्कुराहट मे छुपी क्यों दिखती कभी तन्हाई भी |
मुस्कुराना बस इक रस्म-भर तो नहीं होता |
ना बाँधो सब्र के बाँधों को मन के कबाट खुल जाने दो |
कुछ कह दो मुख से कुछ आँखों से बह जाने दो |
क्योकि मुस्कुराना बस एक रस्म – भर तो नहीं होता |
दिखेगी चेहरे पे फख्त वो रौनक वो सच्ची मुस्कान भी |
गम की परछाईयों को जो अँधियारे मे औझल कर देगी |
होगा उजियारा फिर नई शुरूआत का लगेगी ज़िन्दगी फिर नई सी |
क्योंकि मुस्कुराना बस एक रस्म- भर तो नहीं होता |||

कामनी गुप्ता

कामनी गुप्ता

माता जी का नाम - स्व.रानी गुप्ता पिता जी का नाम - श्री सुभाष चन्द्र गुप्ता जन्म स्थान - जम्मू पढ़ाई - M.sc. in mathematics अभी तक भाषा सहोदरी सोपान -2 का साँझा संग्रह से लेखन की शुरूआत की है |अभी और अच्छा कर पाऊँ इसके लिए प्रयासरत रहूंगी |

3 thoughts on “मुस्कुराना….रस्म – भर तो नहीं

  • अरुण निषाद

    kya bat hai

  • विजय कुमार सिंघल

    बढ़िया कविता.

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    बहुत खूब .

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