कविता

सर्द रात की ठिठुरन में….

सर्द रात की ठिठुरन में भी जीना सीख लिया उसने।
आंसू के धारे सा हर गम पीना सीख लिया उसने।
आग उगलती दोपहरी में नंगे पांव झुलस लेता है।
बेदर्दो की दुनियां में यूं जीना सीख लिया उसने॥

कापी और कलम के बदले हाथो में जूठे बरतन है।
मां की प्यारी गोद नही है सडको पर भटका जीवन है।
कहीं पे महलो की रंगत में आनंदो के भोग सकल है।
कहीं एक रोटी की खातिर ढाबों पर बिकता बचपन है॥

कुत्ते कोट पहनते है इन्सानी बचपन नंगा है।
सब दौलत का खेल यहां है,सब ताकत का दंगा है।
ईश्वर तेरी दुनियां मे इंसान इंसान नही दिखते।
कुछ लोगों का तन नंगा है, पर कुछ का मन भी नंगा है

सतीश बंसल

*सतीश बंसल

पिता का नाम : श्री श्री निवास बंसल जन्म स्थान : ग्राम- घिटौरा, जिला - बागपत (उत्तर प्रदेश) वर्तमान निवास : पंडितवाडी, देहरादून फोन : 09368463261 जन्म तिथि : 02-09-1968 : B.A 1990 CCS University Meerut (UP) लेखन : हिन्दी कविता एवं गीत प्रकाशित पुस्तकें : " गुनगुनांने लगीं खामोशियां" "चलो गुनगुनाएँ" , "कवि नही हूँ मैं", "संस्कार के दीप" एवं "रोशनी के लिए" विषय : सभी सामाजिक, राजनैतिक, सामयिक, बेटी बचाव, गौ हत्या, प्रकृति, पारिवारिक रिश्ते , आध्यात्मिक, देश भक्ति, वीर रस एवं प्रेम गीत.

2 thoughts on “सर्द रात की ठिठुरन में….

  • विजय कुमार सिंघल

    उत्तम कविता

    • सतीश बंसल

      शुक्रिया सर…

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