कविता

नकली फूल….

नकली फूल, बनावट की खुशबु का है व्यापार
गुलशन की क्यूं फिक्र करे, व्यापारी सत्तादार।
होने लगे आदर्श कलंकित, हर दिन बारंबार
बिकता है अब झूठ लगाकर, बोली सरे बाजार॥

होने लगा पतन कुछ ज्यादा, वाणी लगी उगलने आग
लगा रही उजले दामन पर, नीयत कैसे कैसे दाग।
उजले तन और काले मन है, मुश्किल है पहचान बडी
आस्तीन में लगे हैं पलने, खतरनाक जहरीले नाग॥

लगने लगी है तोहमत अब युग पुरुषों पर, हैरानी है
इस युग में सच्चाई की बातें, कितनी बेमानी है।
थाम कलेजा देख रही है, हैरत भरी निगाहों से मां
राष्ट्रभक्ति के नाम पे हो रही, कैसी ये मनमानी है॥

मेरी वो गंगा जमनी तहजीब, बहुत सदमे में है
मेरी रंगों की होली और ईद बहुत सदमे में है।
रोती हूं बेहाल बहुत हूं, अपनों के ही छल से मैं
मेरी मानव सदभावों की, उम्मीद बहुत सदमे में है॥

सतीश बंसल

*सतीश बंसल

पिता का नाम : श्री श्री निवास बंसल जन्म स्थान : ग्राम- घिटौरा, जिला - बागपत (उत्तर प्रदेश) वर्तमान निवास : पंडितवाडी, देहरादून फोन : 09368463261 जन्म तिथि : 02-09-1968 : B.A 1990 CCS University Meerut (UP) लेखन : हिन्दी कविता एवं गीत प्रकाशित पुस्तकें : " गुनगुनांने लगीं खामोशियां" "चलो गुनगुनाएँ" , "कवि नही हूँ मैं", "संस्कार के दीप" एवं "रोशनी के लिए" विषय : सभी सामाजिक, राजनैतिक, सामयिक, बेटी बचाव, गौ हत्या, प्रकृति, पारिवारिक रिश्ते , आध्यात्मिक, देश भक्ति, वीर रस एवं प्रेम गीत.

One thought on “नकली फूल….

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत सुंदर !

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