गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल- काम नेकी के नहीं बेकार जाते हैं

बहस की बात से हम साफ कर इन्कार जाते हैं
अगर उनको खुशी मिलती, खुशी से हार जाते हैं.

वो कहते-हमसे मिलना है तो आओ पार दरिया के,
हमें मिलना ही होता है, नदी के पार जाते हैं.

छपा था उनके सँग फोटो कभी इक बार अपना भी,
कहीं भी जाते हम लेकर वही अखबार जाते हैं.

जहाँ इतवार को उनसे मिले थे वर्षों पहले हम,
अभी भी हम वहाँ कुछ पल को हर इतवार जाते हैं.

कभी बीमार, हो जाते हैं अच्छे इश्क़ में पड़कर,
कभी कुछ इश्क़ में पड़ते तो हो बीमार जाते हैं.

वो रूठें, काम है उनका, मनाना काम है अपना,
हमेशा रार करते वो, किये हम प्यार जाते हैं.

वो-“जाओ-जाओ” कहते हैं मगर हम जो चल देते हैं,
पकड़कर हाथ कहते वो- “कहाँ सरकार जाते हैं.”

लगाओ पेड़, छाया वो कभी तो देगा ही देगा,
कभी भी काम नेकी के नहीं बेकार जाते हैं.

डाॅ. कमलेश द्विवेदी
मो.09415474674

One thought on “ग़ज़ल- काम नेकी के नहीं बेकार जाते हैं

  • विजय कुमार सिंघल

    बहुत शानदार ग़ज़ल !

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